chhand duha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
chhand duha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

कवित्त / शम्भुदान चारण

शम्भुदान चारण

Add caption


पृथ्वी को गुरु है मान , जड़ता स्वरुप ताको ,
चकोर आकर अरु खावण आहार है 
टक टक शब्द बीज लंग वाको पचा पल 
पीला रंग चाल बारह , आंगुल पह्चान्यो है 
दोय तो कहिजे इन्द्री , घ्राण अरु गुदा नाम 
घ्राण ज्ञान इन्द्री गुदा कर्म कूँ ही जान्यो है
वास तो कलेजा माहि , व्दार गुदा उप चाल 
समुख चले है श्वांस डेढ़ सौ बखान्यो है ||1||

जल को गुरु है विष्णु , शीतल स्वभाव ताको 
अर्ध चक्र आकार अरु , मैथुन आहार है 
चुल चुल शब्द बीज , रंग जाको चालीस पल 
सफेद ही रंग चाल सोलह आंगुल जाणियो है 
वास तो ललाट मांही , व्दार लिंग उप चाल , 
नीचे कूँ चले है श्वांस एकाविसी जन्यो है 
दोय तो कहिजे इन्द्री जिभ्या अरु लिंग जाण 
जिभ्या ज्ञान इन्द्री, लिंग कर्म ही कैवायो है ||2||

गुरु शिव तेज ही का , स्वभाव प्रज्वलित ,
त्रिकोण आकार अरु रूप ही आहार है
भूक भूक शब्द टेम है तीस पल 
लाल रंग चाल , चार आंगुल पह्चान्यो है 
दोय तो कही जे इन्द्री पैर नेत्र उनही के 
नेत्र ज्ञान इन्द्री , पैर कर्म को कवायो है
वास तो पीठ के मांही नेत्र व्दार उनही के 
उप चाल ऊपर कूँ नब्बे श्वांस मान्यो है ||3||

वायु को गुरु है ब्रह्म चलित स्वभाव ताको 
आकार ही गोल अरु गंध जूं आहार है 
सी सी शब्द बीज यंग बीस पल हरा रंग ,
चाल आठ आंगुल , यह सही कर भाख्यो है 
दोय तो कही जे इन्द्री , हाथ अरु त्वचा जाण 
त्वचा ज्ञान इन्द्री हाथ कर्म को केवायो है 
वास तो नाभि के मांही , व्दार नाक उपचाल,
तीरची चले है श्वांस साठ ही कहवायो है ||4||

आकाश को निरंजन गुरु शून्य स्वभाव है
आकार ही निराकार , शब्द जू आहार है
शब्द प्रतिधुनी वांको , बीज हंग दस पल 
श्याम रंग चाल , अर्थ आंगुल हम जान्यो है
दोय तो कहिजे इन्द्री शोत्र वाक् उन्ही के ,
ज्ञान इन्द्री शोत्र वाक् कर्म को कैवायो है 
वास तो सीस के मांही , व्दार कान उप चाल 
न मालूम तीस श्वांस, शम्भू है ही बखान्यो ||5||





हिंगलाज माता छंद नाराच

हिंगळाज माताजी री स्तुति। कविराज बचुभाई (जीवा भाई रोहडिया)

    
hinglaj mata pakistan

         

दोहा

चाहत जिणने वृंद सुर,चारण सिध्ध मुनीन्द्र।
ढूंढत है नित ध्यान मंह,करण सृष्टि सुखकंद॥1॥
मो सम को नंह पातकी,तौ सम कौण दयाळ।
डुबत हुं भवसिंधु मंह,तार जणणी ततकाळ॥2॥
कोटि अकोटि प्रकाश कर,वेद अनंत वे अंश।
जगत जणेता जोगणी, विडारण दैतां वंश॥3

      छंद: नाराच

विडारणीय दैत वंश सेवगाँ सुधारणी।
निवारणी विघन अनेक त्रणां भुवन्न तारणी।
उतारणी अघोर कुंड अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥1॥


रमे विलास मंगळा जरोळ डोळ रम्मिया।
सजे सहास औ प्रहास आप रुप उम्मिया।
होवंत हास वेद भाष्य वार वार विम्मळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥2॥


रणां झणां छणां छणां विलोक चंड वाजणां।
असंभ देवि आगळी पडंत पाय पेखणां।
प्रचंड मुक्ख प्रामणा तणां विलंत त्रावळां।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥3॥


।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।



रमां झमां छमां छमां गमे गमे खमा खमा।
वाजींत्र पे रमत्तीये डगं मगं तवेश मां।
डमां डमां डमक्क डाक वागि वीर प्रघ्घळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥4॥


सोहे सिंगार सब्ब सार कंठमाळ कोमळा।
झळां हळां झळां हळां करंत कान कुंडळा।
सोळां कळा संपूर्ण भाल है मयंक निरमळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥5


राजिया रा सोरठा

छपन्न क्रोड शामळा करंत रुप कंठळा।
प्रथी प्रमाण प्रघ्घळा ढळंत नीर धम्मळा॥
वळे विलास वीजळा झमां झऴो मधंझळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥6॥

 




नागेशरां जोगेशरां मनंखरा रिखेशरां।
दिनंकरां धरंतरां दशे दिशा दिगंतरां।
जपै “जीवो” कहे है मात अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥7॥


रंगभर सुंदर श्याम रमै ( रेणकी छंद )

 रेणकी छंद



सर सर पर सधर अमर तर अनसर,करकर वरधर मेल करै।

हरिहर सुर अवर अछर अति मनहर, भर भर अति उर हरख भरै

निरखत नर प्रवर प्रवरगण निरझर, निकट मुकुट सिर सवर नमै।
.
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।1



झणणणणण झणण खणण पद झांझर, गोम घणा गणणणण गयणै।

तणणण बज तंत ठणणण टंकारव,रणणण सुर धणणण रयणै।

त्रह त्रह अति त्रणण ध्रणण बज त्रासा,भ्रमण वत रमण भ्रमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।2





झट पट पर उलट पलट नटवत झट, लट पट कट घट निपट ललै।

कोकट अति उकट गति धुन कट, मन डरमट लट लपट मलै।

जमुना तट प्रगट अमट अट रट जूट, सूर पट खेखट तेण समै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।3


धमंधम अति धमक ठमत पद घूमर,धमधम फळ सम होत धरा।

भ्रम भ्रम वत विषय परिश्रम व्रत भ्रम, खमखम दम अहि विडुम खरा।

गम गति अति अगम निगम न लहत गम, नटवत रमझम गम मन में।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।4


गत गत पर ऊगत तूगत नृत प्रियगत, रत उनमत चित वधत रति।

तत पर घ्रत नचत उचत मुख थैथत, आब्रत अत उत भ्रमत अति।

धिधितत गत वजत मृदंग सुर उपजत, कृत भ्रत नर तम अतंत क्रमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।5


ढल ढल रंग प्रगल अढल जन पर झल,झल अल कल तेज झरै।

खलखल भुज चूड़ चपल अति खमकत, कान कतोहल प्रबल करै।

वलवल गल हस्त तु मल चल चितवल, जुगल जुगल प्रति रंग भरै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।6


सरवस वस मोह दरस सुरथित शशि, अरस परस त्रस चरस अति।

कसकस पट हुलस विलस चित आकृष, रस बस खुश हस वरस रति।

ट्रस नव रस सरस भयो ब्रह्मानंद, अनरस मनस तरस अधमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।7





रचियता :- ब्रह्मानंद  स्वामी (लाडुदान गढवी)

।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।

 दर्योधन भरी दुरमत ,

खीजत सारी खांच ।

दीन पुकारै द्रोपदी

पांडव बैठा पांच ।

"नाग दमण" भुजंगप्रयात




।। छंद  मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।


पांच पती बिच लाज पछाड़त ,

 दी वचनां बध दानव धारी ।

खींचत चीर सभाय खचाखच ,

 दौपद को कुण दै दिल दारी ।

कौरव काळ भयो किण कारण ,

नारण आगळ कूकत नारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(१)




हेरत लाज जुऐ मिज हारत ,

 प्रीतम कोण बणै पतधारी ।

कौरव क्रोध कियो जब कायम ,

कोय न लागत है अब कारी ।

भीषम भाव भयो भय भीषण ,

है न विभीषण ना हितकारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी।(२)


 खेद मती दुरियोधन खेलत ,

सायब देखत खीचत सारी । 

हालत हीन दुराचर हींसत ,

पींचण पाप पगो पग पारी ।

द्रोपदि धीर अधीर दुसाशन ,

ना सत छौड़त नासत नारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(३)



पांडव दाव बधैं सब पांखड ,

हो सकुनी धत हीमत हारी ।

पांच पती अब है पछतावत ,

लानत दैकर जो ललकारी ।

साच छुटे छिटके सत सायब ,

नाविक कोण बणै निरधारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(४)


पीर परी गिरधारिय पारत ,

लानत तोड़ करो ललकारी ।

हे बलदेव बधूं बन हीमत ,

बेनड़ काज बणो बलधारी।

कूक सुणी जब कान कड़ाकड़ ,

खोट लगी दुरयोधन खारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(५)


चीर बढ़ाकर चेन चुराकर ,

दी ललकार दु सासन धारी ।

हीमत हार हतास कियो हठ ,

सींचत चीर बढी बहु सारी ।

द्रौपद काज ख्याल रखे दिल ,

दीन दयाल दिवी दिलदारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी।(६)


अम्ब उसी पल आ अवतारित ,

सींचत जैम बढ़ी बहु सारी ।

पारण पार प्रभू पत पैखत ,

दीसत ना उथ दानव चारी ।

भाव सचै भगवान भजो तुम ,

प्रीत तहां रखसी पतधारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(७)



          ।। छप्पय ।।

द्रौपद तणी दहाड़ , हाजिर हुओ हितकारी ।

दैण दुसाशन दाद ,पाळौ पुगो पतधारी ।

खींचताण खूंखार , सत पत बढाई सारी ।

पंचाळी सुण पुकार , गौरव बणै गिरधारी ।

सत अम्ब रखे नित सांवळौ , पंचाळी चीर पुरयो ।

करुणा द्रोपदी करे कृष्ण, धर्म सत गीता धरयो ।

आम्बदान जवाहरदान देवल आलमसर 


मातेश्वरी स्तुति (छंद - भुजंगप्रयात*)


*🙏🏻छंद - भुजंगप्रयात*🙏🏻



दुष्ट विकारो डारिणी मंगल करणी मात
भवसागर भव तारिणी वंदू माँ विख्यात

नमामी प्रभा पार्वती वेदमाता
प्रसिद्धा तुं सिद्धा जगत जन्मदाता
मृडानी महामेघमाला निराला
तुं ही चैतरी रक्तदन्ता कराला

अभीरु तुं ही भैरवी भोग ग्राही
तुं ही वायुमंडळ खडक तुं प्रवाही
अनामी तुं ही तुं सहस्त्राय नामी
तुं ही सिद्धिदा बुद्धिदा सर्वगामी

तुं ही ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्य शूद्रा
तुं ही मूलधारा तुं ही मूलमु़द्रा
तुं ही अष्टसिद्धि प्रदायं भवानी
तुं ही भाण रुपे युगे युग रवानी

तुं ही ज्योत रुपे प्रदीपं प्रकाशी
बनी ज्योत ज्वाळा वळी दैत नाशी
तुं लक्ष्मी स्वरूपे महामोह माया
तुं ही कामदा मोक्षदा शंभु जाया


महाकाल कालं करालं तुं काली
तुं ही देव तारण दयाली कृपाली
तुं ही लेखिनी लेख लेख्या सुलेखा
तुं संध्या सुपर्वा सुमेधा सुरेखा

तुं ही बालक्रीड़ा वयोवृद्ध रूपं
तुं दिव्या तुं दीप्ता अनेका अनूपं
तुं प्राची अवाची जगत जन्मदात्री
धरा धान धरणी शिशूप्रिय धात्री

तुं ही डाकिनी हाकिनी दीर्घनिंद्रा
तुं ही नूतना पूतना मात इंद्रा
निशाचर हरी अट्टहासं करंती
तुं ही दिव्य शक्ति त्रिलोके फरंती

तुं ही अन्नपूर्णा भये अन्नपुष्टि़ 
तुं ही मेघमंडल तणी घोर वृष्टि़ 
धरी ध्यान म्हारी अरज कान लीजो
सदा कूख चारण जनम सिद्ध दीजो



मार्गबंधुम स्त्रोत

मार्गमानधुम स्त्रोतम







शम्भो महादेव देव देव शिव शम्भो महादेव देव शिव
शम्भो शम्भो महादेव देव देव ॥धृ॥

फालावनम्रत् किरीटं भालनेत्रार्चिषा दग्धपंचेषुकीटम् ।
शूलाहतारातिकूटं शुद्धमर्धेन्दुचूडं भजे मार्गबंधुम् ॥शम्भो॥

अंगे विराजद् भुजंगं अभ्र गंगा तरंगाभि रामोत्तमांगम् ।
ॐकारवाटी कुरंगं सिद्ध संसेवितांघ्रिं भजे मार्गबंधुम् ॥शम्भो॥

नित्यं चिदानंदरूपं निह्नुताशेष लोकेश वैरिप्रतापम् ।
कार्तस्वरार्गेद्र चापं कृतिवासं भजे दिव्य मार्गबंधुम् ॥शम्भो॥

कंदर्प दर्पघ्नमीचं कालकण्ठं महेशं महाव्योमकेशम् ।
कुन्दाभदन्तं सुरेशं कोटिसूर्यप्रकाशं भजे मार्गबंधुम् ॥शम्भो॥

मंदारभूतेरुदारं मंथरागेन्द्रसारं महागौर्यदूरम् ।
सिंदूर दूर प्रचारं सिंधुराजातिधीरं भजे मार्गबंधुम् ॥शम्भो॥

अप्पय्ययज्वेन्द्रगीतं स्तोत्रराजं पठेद्यस्तु भक्त्या प्रयाणे ।
तस्यार्थसिद्दिं विधत्ते मार्गमध्येऽभयं चाशुतोषी महेशः ॥

शंभो महादेव देव शिव शंभो महादेव देवेश शंभो शंभो महादेव देव ॥
॥ इति अप्पय्य दीक्षितप्रणितम् श्रीमार्गबन्धुस्तोत्रम् संपूर्णम् ॥

माँ कलिका ( छंद सारसी )

दोहा
दसविध री देवी महा,प्हैली काली रूप।
आवड कीरत आखवा,आखर देय अनूप॥1

काली रूप कपालिनी, खपराळी खळ खाण।
नरमुँड माळी व्यालिनी,प्याली शोणित पान॥2


छंद सारसी
क्रां भद्रकाळी, क्रीं कृपाळी, क्रूं कराली, कालिका।

मां मुण्डमाळी, डं डमाली, वपु विशाळी, ज्वालिका।

जय जगतपाली, वृद्ध बाली वेश भाळी मावडा।

काली कराली, वदन वाली, अस्थिमाली, आवडा॥1


समसान वासी, अट्टहासी, वपुअमासी, कज्जला।

प्रति पल पिपासी, पुंज राशी, भव्य भासी, चप्पला॥

मेटो उदासी, हिये वासी, फँस्यौ फासी, डावडा।

काली कराली, वदन वाळी, अस्थि माळी, आवडा॥2


मां शवारूढा, गहन गूढा,बाळ बूढा, वेसरी।

गळमाळ तुंण्डा, तुं चामुँडा, शगत झुंडां, ले खरी।

खळ महिख खंडा, चंड मुंडा, दैत दंडा, तुं वडा॥

काळी कराली, वदन वाळी, अस्थिमाली आवडा॥3


जय खळ खपाणी, खडग पाणी, राज राणी, शंकरा।

सगती शवानी, मां शिवानी, है श्मशानी, तूं परा।

वरदान दानी, जगतजांणी, है ईशानी, भख-मडा।

काळी कराली वदन वाळी,अस्थिमाली आवडा॥4


घन नील श्यामा, शर्व वामा, हे ललामा, कामदा।

भव तणी भामा,विविध नामा, वंदना मां, सर्व दा।

काटो तमामा, वेदना म्हां, हिय हामां, डावडा।

काली कराली, वदन वाली , अस्थिमाली, आवडा॥5


त्रय नेत्र वाली, वहै पाळी, घण उताळी, हिंगुला।

मुख जिह्व ज्वाली, वपु विशाली,महा काली, चंचला।

दंष्ट्रा डढाळी, हे दयाळी, नेह न्याळी, धा वडा।

काली कराली, वदन वाळी, अस्थिमाली आवडा॥6


खळ दळां खंडी,दैत दंडी, मां प्रचंडी, ईसरी।

जळहळ अखंडी, लाल झंडी, युध्द चंडी, तूं खरी।

चामुंड चंडी, विश्व वंदी, मात मंडीत तु वडा।

काली कराली, वदन वाली, अस्थिमाली आवडा॥7


क्लीं कान्ह कारी, रूप वारी, शव सवारी, वंदना।

दिगवसन वारी, है हजारी, वार वारी, प्रार्थना।

नरपत तिहारी, शरण मां री, कर दया री, मामडा।

काली कराली, वदन वाली, अस्थिमाली, आवडा॥8



दोहा

आवड मावड आपही, काली कृष्ण स्वरूप।
नमन मात महिमामयी,भवा आप सुरभूप॥

~~वैतालिक

शिव तांडव (छंद - दुर्मिला)

शिव वंदना 



                   (छंद - दुर्मिला)


भभके गण भूत भयंकर भुतळ,नाथ अधंखर ते नखते,

भणके तळ अंबर बाधाय भंखर,गाजत जंगर पांह गते 

डमरुय डडंकर बाह जटंकर ,शंकर ते कईलास सरे,

परमेश्वर मोदधरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे1


हडडं खडडं ब्रह्मांड हले,दडडं दडदा कर डाक बजे,

जळळं दंग ज्वाल कराल जरे,सचरं थडडं गण साज सजे

कडके धरणी कडडं,हडडं मुख नाथ ग्रजंत हरे,

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे(2)


हदताळ मृदंग हुहूकट,हाकट धाकट धीकट नाद धरं,

द्रहद्राह दिदीकट वीकट दोक्ट,कट्ट फरंगट फेर फरं 

धधडे नग धोम धधा कर धीकट,धेंकट घोर कृताळ धरे,

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे(3)


नट तांडवरो भट देव घटां नट उलट गूलट धार अजं

चहँ थाक दुदूवट दूवट खेंखट,गेंगट भू कईलास ग्रजं 

तत तान त्रिपुरारि त्रेकट त्रुकट,भूलट धुहर ठेक भरे,

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे(4)


सहणाई छेंछ अपार छटा,चहुथ नगारांय चोब रडे,

करताल थपाट झपाट कटाकट,ढोल धमाकट मेर धडे

उमया संग नाट गणं सरवेश्वर,ईश्वर 'थईततां,' उचरे,

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे(5) 


पहरी गंगधार भेंकार भुजंगाय ,भार अढारिंय वृक्ष भजे,

गडताळ अपार उठे पडघा,गढ सागर त्रीण ब्रह्मांड ग्रजे,

हदभार पगांय हिमाचळ हालत,हालत नृत्य हजार हरे ,

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे(6)


बह अंग परां धर खाख अडंबर डंबर सुर नभं दवळा,

डहके डहकं डहकं डमरु बह,डूहक डूहक थे बनळा 

हदपाळ कराळ विताळरी हाकल,पाव उपाडत ताळ परे,

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे(7)


ब्रह्मादिक देख सतं भ्रमना भर,सुर तेत्रीशांय पाव सबे,

खडडं कर हास्य ब्रह्मांड खडेडत,अंग उमा अरधंग अबे 

जगजावण आवण जोर नचावण,आवत *काग* तणे उपरे

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(8)



                रचियता :- दुला भाया काग
                                     प्रेषक 
                               आशुतोष चारण 
                              जय महाकाल ग्रुप

छंद त्रिभंगी ( नीतिगत छंद )

छंद त्रिभंगी ( नीतिगत छंद )

नीति 


दोहा 

हर विपति हाथसे , डर पर दारा दाम .


धर ईश्वर नित ध्यानमे , कर नेकी के काम .

छंद त्रिभंगी

कर नेकी करमसे डरपर धरसे , पाक नजरसे धर प्रिती.


जप नाम जीगरसे बाल उमरसे , जसले जरसे मन जीती .


गंभीर सागरसे रहे सबरसे , मिले उधरसे परवाना .


चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना , जगने आखर मर जाना..||1||



मद ना कर मनमे मिथ्या धनमे , जोर बदनमे जोबनमे.


सुख हे न स्वपनमे जीवन जनमे , चपला धनमे छनछनमे.


तज वेर वतनमे द्रेश धरनमे नाहक ईनमे तरसाना .


चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना , जगने आखर मर जाना..||2||



जुठा हे भाई बाप बडाई , जुठी माई माजाई .


जुठा पित्राई जुठ जमाई , जूठ लगाई ललचाई.


सब जूठ सगाई अंत जुदाई , देह जलाई समसाना .


चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना , जगने आखर मर जाना..||3||



कोई अघिकारी भुजबलभारी कोउ अनारी अहंकारी .


कोउ तपधारी फल आहारी , कोउ विहारी वृतधारी .


त्रस्ना नहीं टारी रह्या भीखारी , अंत खुवारी उठ जाना .


चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना , जगने आखर मर जाना..||4||



तज पाप पलीती असत अनीती , भ्रांती भीती अस्थिती .


सज न्याय सुनीति उत्तम रिती , प्रभू प्रतिति धर प्रिती .


ईन्द्री ले जातीसुख साबिती , गुण माहिती द्रढ ज्ञाना .


चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना , जगने आखर मर जाना..||5||



दुनिया दो रंगी तरक तुरंगी , स्वार्थ संगी अेकंगी .


होजा सतसंगी दुर कुसंगी , ग्रहेन  टंगी जम जंगी .


*पिंगल* सुप्रसंगी रचे उमंगी , छंद त्रिभंगी सरसाना .


चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना , जगने आखर मर जाना..||6||



*रचियता :- कवि श्री पिंगळशीभाई पाताभा ई नरेला*

शिव वंदना छंद त्रिभंगी

                     ।। शिव वंदना।।

                           दोहा

         जय शंकर गणनाथ नाथ त्रिभुवन स्वामी,
          रहत सहाय हमेस हरत अघ खलकामी।।
                      

  छंद त्रिभंगी


रहत कैलासा,अद्भुत वासा,एकांत निवासा अणप्यारा,
होवत हुल्लासा,तुरत प्रकासा,हटत निरासा हर बारा
पुरण जिज्ञासा, मन की आसा,ताण्डव नृत्यम् सुकरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव शरणम्।।1।।

डमरु डम डमडम,घुघर घमघम,झालर झमझम तुरत बजे
शंकर सुसजनम्,मृगमद बजनम्,भावत भजनम् नान्दी सजे,
पद पंकज रजनम्,ध्यावत सज्जनम्, पावन पूजन श्री चरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव  शरणम्।। 2।।

जोगी अणपारा,ध्यानी धारा,पार न पारम् आवाजा
तरणी हर तारा,हर दुख हारा,फरसा धारम् नटराजा
चारण गण सारा,दास तिहारा,होत निहाला भयहरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव शरणम्।। 3।।

मुण्डन गलमालम्,भुज विशालम्,आँक की मालम् गल सजनम्
अद्भुत छालम्,मृग की खालम्,भस्म निराली तन रंजनम्
सुन्दर पद तालं,रहत त्रिकालम्,गंग पियारी सर धरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव शरणम्।। 4।।

उम्मया नित संगा,शीश पे गंगा, गले भुजंगा किरपाळा
होवत उमंगा,बजत मृदंगा,भुत भभंगा विकराळा
रहवत निज रंगा,खावत भंगा,भक्तजनन तव सुखकरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव शरणम्।। 5।।

विपत विडारी,सब सुखकारी,होवत भारी,त्रिपुरारी
गिरजा अतिप्यारी,पुजत नरनारी,जाँउ वारी बलिहारी
विश्व विहारी,दृढ़ ब्रम्हचारी,रहुँ कैलासी नितचरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव शरणम्।। 6।।

चन्दन सुभालम्,सिर केश निरालम्,दानवदालम् अघहारा
तरणी हर तारम्,काल कृपालम्, नैन विशालम् भयहारा
कर शुल धारम्,विरद विशालम्,दास निहालम् भवतरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव शरणम्।। 7।।

जोगण पथ ध्यानी,गावे ग्यानी,भेंट सुहानी बिलपतरम्
अद्भुत दानी,चिमटी वानी,कुबेर कहानी सम्पुरम्
बेहद नादानी, आतुर बानी, "आशुतोष " तव गुण वरणम्
जय महाकालम् आप कृपालम् दीनदयालम् तव शरणम्।। 8।।


                         ।।  छप्पय।।

  नमामि भोलेनाथ, देव महादेव निराळा
  नमामि भोलेनाथ, करत संतन प्रतिपाळा
  नमामि भोलेनाथ, अद्भुत कर रुप निहारी
  नमामि भोलेनाथ, वारी वारी जाँउ बलिहारी
दोय कर जोड़ "आसु" कहे सुणो विनय मम् तात
नन्दी बेगो हांकजो तुरत सुणत आवाज।।
                                     कृत


                             आशुतोष चारण

हनुमंत वंदना ( छंद : रेंणंकी )

.                        || हनुमंत वंदना ||        

.                





.                              छंद : रेंणंकी


हूहू कट कर हाक, डाक पड दशमन, कडड थडड कपी यंत कीयो
धणणण ध्रुज धरण, खडग हथ खणणण,गणण व्योम हनुमंत गीयो,
हणणण भयी हुप, सूप अन सणणण,भणण भगण अहूंरांण भयो
चडीया चरी तंग, संग जप समरण,  रुदय रंग बज रंग रयो....||01||


दुसमन दसकंध, बंध सूत बरणन धरण ढंक अखियंक धस्यो
टणणण टंकार तांण धनुं तणणण, हणणण काज हनु मान हस्यो
अखरण भूह खरण चरण हनवण चट ढरण धरण पद देह ढयो
चडीया चरी तंग संग जप समरण रुदय रंग बज रंग रयो....||02||


डग मग दीग्ग पाल काल दत कडडड कौप मनोहरी कंथ कीयो
घुघु घुघु घुघवाट फाट दधी फडडड, हुडुड हुडुड जळ हबक हीयो
गणणण ग्रज गोम धणण पड़ धुरजण, डणक हाक हनुमंत डयो
चडीया चरी तंग संग जप समरण रुदय रंग बज रंग रयो....||03||


सणणण सूर मैघ बकत लब बणणण, रणगण रावण रदय रीजे
दरसत द्रग रकत तकत नभ धरणण, खणणण ईंन्दर जीत्त खीजे
हुंहुं कार खार उदगार उचरणण, गणणण दशसिर सूत गयो
चडीया चरी तंग संग जप समरण रुदय रंग बज रंग रयो....||04||


हुंम्हु हहा कर हास पास ब्रम पणसत,डणसत दिख हनुमान डर्यो
फणसत लज फोग ओग घट अणसत धरण लाज नीज देह धर्यो
बंधन बदनाय वदन हस जगमग अडग अंजनी लाल अयो
चडीया चरी तंग संग जप समरण रुदय रंग बज रंग रयो....||05||


दैखत दस कंध बंध वपु बंदर, अंदर से अट्ट हास अच्यो
कटकट कपी दंत देख कुळ दैतण, मंद उदरि मन फाट मच्यो
कडडड कडडाट त्रुटत दीख तंगड, बंगड ज्यो बणणाट बयो
चडीया चरी तंग संग जप समरण रुदय रंग बज रंग रयो....||06||


धणणण बज धौंस पौछ जलवण कज अडड अडड सब अहर असै
जणणण घट जंज बजत नित जोगड, हडड हडड हनुमंत हसै
रटग्यो हनुमंत रपट घट रसणन, जयजय जय रघुवीर जयो
चडीया चरी तंग संग जप समरण रुदय रंग बज रंग रयो....||07||


हडडड हनुमान, कीयो हूप़  हूप हूप ,रुप रुप ज्यों नटराज रम्यो
जळळळ जोगिदान जाळ भयी जळळळ भळळ भूप भय भीत भम्यो
अडडड भयी आग, जडड हड जपटण, लपट झपट जद लंक लयो
चडीया चरी तंग संग जप समरण रुदय रंग बज रंग रयो....||08||


              छप्पय


कडड दंत कडेडाट,नाट नटराज नचायो
धडड धरा धडेडाट, दाट दैतांण डचायो
हडड धस्यो हनुमान,दान जोगड दरसायो
गणणण करंतो गान, जान की वर नभ गायो
लंक अटंकण डंक दींण, समरथ रघुवीर संग है
मरकट भड़ महावीर सम,  रदय रंग बजरंग है


 रचना : जोगीदान गढवी (चडीया)


श्री हिंगलाज देवी की स्तुति

श्री हिंगलाज देवी की स्तुति


दोहा


एका नेका अज्ञेया अजा अनंता नाम
अगम अलक्षा ईश्वरी, पुनी पुनी करों प्रणाम।

उपजावनी खपावनी, विश्वंभरी बडराय
जय हिंगोल जगपावनी, महादेवी महमाय।

शंकरणी शंकरप्रिया, बिघन हरणि वृषगामि
तारण तरणी त्रयंबका, पातु पातु प्रणमामि।

हिंगोळा अघहारणी



छन्द हरिगीत


प्रणमामि मातु पे्रम मूरति, पार्वती परमेस्वरी
शंाति क्षमामय कृपासागरि, सुखप्रदा सरवेस्वरी
सेवक सिसू के दुरित दारिद, विघ्न दोष बिदारणी
आदि शक्ती नमो अंबा, हिंगळा अघहारणी।1।


सब देवियां सिरछत्र, सांता द्वीपरी राजेस्वरी
कोहला पर्वत कंदरा की, निवासी निखिलेस्वरी
आनंद वदनी आशुतुष्टा, कृपा मंगल कारणी
नकळंक रूपा नमो अंबा, हिंगळा अघहारणी।2।


देवां सिरोमणि महादेवी, सामरथ सरवोपरी
स्तुति करत चारण सिद्ध सुरमुनि, शेष अज शकर हरी
परिताप हरणी प्रणत जन के, सकळ कारज सारणी
आंेकार रूपा नमो अंबा, हिंगळा अघहारणी। 3।


जगधात्रि जागति ज्योति देवी, जोगमाया जोगणी
असवार नाहर तणी अणडर, अहर खळ आरोगणी
सोगणी समरथ सुरासुरथी, महिस मदमत मारणी
नवलाख रूपा नमो अंबा, हिंगळा अघहारणी। 4।


गिरिजा ब्रह्मचारिणी गौरी, चंद्रघंटा स्कंदमा
कात्यायनी पुनि काळरात्री, कूसमांडा सिद्धिदा
सरणागति निज दास सुर के, दैत्य दुसमन दारणी
नवरूप दुर्गा नमो अंबा, हिंगळा अघहारणीं । 5।


वृषभासनी वाघासणी, गरूडासणी गजआसणी

मयूरासणी महिषासणी, हंसासणी प्रेतासणी

विध विध वपू आयुध वाहन, धरम हेतूधारणी

अदभूत रूपा नमो अंबा, हिंगळा अघहारणी।6।


ब्रह्मी महेस्वरी वैष्णवी, कोंमारी दानवा दर्पहा
वाराहि अैंद्री, नारसिंघी चंडी चामुंडा महा
सुर संत त्राता असुर हाता, अवनि भार उतारणी
अकळीत रूपा नमो अंबा, हिगळा अघहारणी ।7।


निज दास शंकरदास को, आरोग्य सुख आयुष प्रदा
संपति प्रदा सिद्धीप्रदा, सिव भक्ति दत शक्ति प्रदा
सुमति प्रदा शोभा प्रदा, कामना पूरण कारणी
नारायणी मां नमो अंबा, हिंगळा अघहारणी। 8।




छप्पय

जय हिंगोळा जगमातु, महालखमी महाकाळी
महा सरसति महादेवि, विकट सुंदर वपुवाळी
एका नेका अजब, अनंता अजा कहाणी
पृथ्वी स्वर्ग पाताळ, प्रगट त्रिभुवन पूजाणी
करजोरि दास शंकर कहत, प्रसन्न होहु परमेष्वरी
सुरतरू स्वभाववाली सुखद, जय हिंगोळ जगदीष्वरी।।P

शिव स्तवन


शिव स्तवन

दोहा

नमौ पिनाकी धूर्जटी, खर्पराशि खट्वांग।
कापालिक दिग वसन धर, पियै गरल अर भांग॥1

मेध घटा शंकर जटा, तडित छटा जनु गंग।
नाचै  नटराजम प्रभु, गरजन जाण मृदंग॥2

शंकर अभयंकर सुखद, प्रलयंकर परमेश।
गिरजावर कैलासघर, हिमगिरि रहण हमेश॥3

छंद :त्रिभंगी

वसतौ गिरि हिम पर,अर गिरिजावर,तन बाघांबर , है धारी।

गळ राखत विषधर, भाल चंद्रधर,जटा गंगधर , त्रिपुरारी।

मन धरत उमंगधर जिणनै मुनिवर,देव दिगंबर, महादेवम्।

जय जय शिवशंकर, हे प्रलयंकर, सुंदर सुखकर, सत्य शिवम्॥1॥


नाचत नटराजम्, नवरस राजम् ,धूंधर बाजम्, छम छम छम।

जाणक घन गाजम्, झांझ पखाजम्, अजब अवाजम्, मिरदंगम्।

संग भूत समाजम्,वृषभ विराजम् गिरजाराजम् चितहरणम्।

जय जय शिव शंकर, हे प्रलयंकर, सुंदर सुखकर सत्य शिवम्॥2



शमशान रहावै,धूनि धखावै, जोग जगावै, नित प्रत हर।

डक डाक बजावै,भूत नचावै,  राख रमावै निज तन पर।

अठ सिध घर आवै, नव निधि पावै, जो जश गावै, पिता परम्।

जय जय शिव शंकर हे प्रलयंकर सुंदर सुख कर सत्य शिवम्॥3


हे वासी काशी, वेस सन्यासी, अज अविनाशी, सुख राशी।

सरिता-तट- वासी, गिरि आवासी ,अरक उजासी , मित भाषी।

काटै जम फांसी, विपद विनाशी,नव निधि दासी, निरमलतम्।

जय जय शिव शंकर हे प्रलयंकर सुंदर सुखकर सत्य शिवम्॥4


माळा उतबंगा,कंठ भूजंगा,नंग धडंगा, सिर गंगा।

शगति अरधंगा, पीवण भंगा,हणण अनंगा, बिन खंगा।

उर भरण उमंगा,लहर तरंगा, मो मन रंगा, तव चरणम्।

जय जय शिव शंकर हे प्रलयंकर सुंदर सुखकर सत्य शिवम्॥5।


जय जय विषपायी, जन सुखदायी, मन सरलाई, महिमायी।

वांछित वर दाई, रहौ सहाई , पडतौ पाई, शरणाई।

कविजन कविताई,  जिण बिरदाई, यश अधिकाई, उण वधियम्

जय जय शिव शंकर, हे प्रलयंकर,  सुंदर सुखकर सत्य शिवम्॥6


कर धरण पिनाकम्, हाकं बाकम्, डम्म डमाकम्, डं डाकम्।

तौ सेव सदाकम्,वांछित पाकम्,सिर पर जाकम्, पति राकम्।

धरणि पर धाकम्, आप अथाकम्, धर फरसाकम्, पी गरलम्।

जय जय शिव शंकर,  हे प्रलयंकर, सुंदर सुखकर सत्य शिवम्॥7


दाहक पति रत्ती, जोगी जत्ती,संग शगत्ती, पारवती।

कर कविता कत्थी, जिम सुरसत्ती, दयी उकत्ती, आप  प्रती।

सुत नरपत वृत्ति, रहत चरण रति , औ ज विनत्ती, रख शरणम्।

जय जय शिव शंकर, हे प्रलयंकर, सुंदर सुख कर, सत्य शिवम्॥8


छप्पय

महादेव मदनान्त,पिनाकी जटी परसुधर।

धुर्जट धारण गंग, अंग भसमंग धरण हर।

त्र्यंबक अंब अरधंग, दिगंबर देव अघोरी।

कापालिक करुणेश,पति गिरि राज किशोरी।

नित नरपत नें निज जाण शिशु,  स्नेह सरित सरसावजो।

शिव आप तणौ शरणौ गह्यौ, दया द्रष्टि दरसावजो॥

नरपत आवड दान आशिया"वैतालिक"कृत



छन्द जात रेणकी

Sriram Chandra



छन्द जात रेणकी




डणणणणण दीस दिगज सह डणकत ,भणण खणण ब्रह्मांड भयो !
गणणणणण गहर गुहागििर गणकत , ठणण ठणण टंकार थयो !
कणणण लंक नृपाळ कणंकत ,गणण गणण शीर मुगट ग्रीयो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत , धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!1!!

कड़ड़ड़ड़ड़ व्योम गोम पड़ कड़कत,अड़ड़ अड़ड़ समुदर उछळं !
थड़ड़ड़ धाम छोड़ खळ थड़कत, धड़ड़ धड़ड़ धर नमत ढळं !
गड़ड़ड़ड़ चंद्र लोक लग गड़गड़, फड़ड़ फड़ड़ हय भांण फर्यो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत , धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!2!!




कटकटकट सपट झपट फटफट कट , खटखट झटपट उलट ज़ट्यो !
भटभटभट भटक भटक भय भट , भट फटक फटक मनु व्योम फट्यो !
घटघट घट अमट अर्यां गभरावट हटहटहट खलदल हहर्यो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत ,धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!3!!

ज़कज़कज़क नमक रमक ज़णकारव,दमक चमक हर ध्यान खूलै !
छकछकमद अछक अछक्के तक तक , भटक भटक भट खटक खूलै !
हकबक हिय सठक गठक टक नाटक , फटक फटक थकथक फफर्यो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत ,धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!4!!




खळभळ अळ प्रबळ प्रबळ तळ पातळ , खळखळ कळ बळ अकळ खसे !
डळडळडळ डळत ढळत भुदरसर ,तळतळ थळथळ सभड़ त्रसे !
ज़ळ ज़ळ ज़ळ ज़ळक ज़ळक कर ज़ळकत, खळक खळक सुर कुसुम खर्यो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत ,धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!5!!

सगवगनग अडग अडग चगचगचग ,जगजगजग रणंकार जग्यो !
टगटगटग टगर टगर मगर खगखगखग ,छगछग रग पग अछग छग्यो !
फगफगफग विलग विलग मग डगडग ,नगनग भग सुरराज नर्यो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत , धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!6!!

खरररर अपर अमरं वरधर पर ,पर धरधर पर अमर पर्यो !
ज़ररर सरर सरर ज़ट ज़ांज़र ,सुरपर परहर सकर सर्यो !
कर कर कर जयति जयति कौशीककर ,धर धर हर धनु सधर धर्यो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत, धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!7!!

सत सत कृत अमत श्रवत दशरत सत ,रजत रडत सुक प्रमुद रह्यो !
ध्रत ध्रत ततकाल हारगल सीतरत , गत मत रत गुरू चरन ग्रह्यो !
क्रत क्रत अत कांन दांन नीज क्रत दत , भजत भजत भव पार कर्यो !
धणणण शेष कोल कच्छ धणकत , धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!8!!
~~~~~~~~~~~~~~कळस छप्पैया ~~~~~~~~~~~~~~
धर्यो धनुष रणधीर , वीस्मय घणा विदार्या !
धर्यो धनुष रणधीर , ताप मुनि गणरा टाळ्या !
धर्यो धनुष रणधीर , लंक रोळण खग लीधो !
धर्यो धनुष रणधीर , काज अमारो वड कीधो !
धर्यो धनुष ब्रह्मांड धर ,धरण भार भूवरो हसी !
चित्त वृथा कान सुरभीय चहे , चण सारुं लेवा असी !!1!!