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हिंगलाज माता छंद नाराच

हिंगळाज माताजी री स्तुति। कविराज बचुभाई (जीवा भाई रोहडिया)

    
hinglaj mata pakistan

         

दोहा

चाहत जिणने वृंद सुर,चारण सिध्ध मुनीन्द्र।
ढूंढत है नित ध्यान मंह,करण सृष्टि सुखकंद॥1॥
मो सम को नंह पातकी,तौ सम कौण दयाळ।
डुबत हुं भवसिंधु मंह,तार जणणी ततकाळ॥2॥
कोटि अकोटि प्रकाश कर,वेद अनंत वे अंश।
जगत जणेता जोगणी, विडारण दैतां वंश॥3

      छंद: नाराच

विडारणीय दैत वंश सेवगाँ सुधारणी।
निवारणी विघन अनेक त्रणां भुवन्न तारणी।
उतारणी अघोर कुंड अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥1॥


रमे विलास मंगळा जरोळ डोळ रम्मिया।
सजे सहास औ प्रहास आप रुप उम्मिया।
होवंत हास वेद भाष्य वार वार विम्मळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥2॥


रणां झणां छणां छणां विलोक चंड वाजणां।
असंभ देवि आगळी पडंत पाय पेखणां।
प्रचंड मुक्ख प्रामणा तणां विलंत त्रावळां।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥3॥


।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।



रमां झमां छमां छमां गमे गमे खमा खमा।
वाजींत्र पे रमत्तीये डगं मगं तवेश मां।
डमां डमां डमक्क डाक वागि वीर प्रघ्घळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥4॥


सोहे सिंगार सब्ब सार कंठमाळ कोमळा।
झळां हळां झळां हळां करंत कान कुंडळा।
सोळां कळा संपूर्ण भाल है मयंक निरमळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥5


राजिया रा सोरठा

छपन्न क्रोड शामळा करंत रुप कंठळा।
प्रथी प्रमाण प्रघ्घळा ढळंत नीर धम्मळा॥
वळे विलास वीजळा झमां झऴो मधंझळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥6॥

 




नागेशरां जोगेशरां मनंखरा रिखेशरां।
दिनंकरां धरंतरां दशे दिशा दिगंतरां।
जपै “जीवो” कहे है मात अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥7॥


रंगभर सुंदर श्याम रमै ( रेणकी छंद )

 रेणकी छंद



सर सर पर सधर अमर तर अनसर,करकर वरधर मेल करै।

हरिहर सुर अवर अछर अति मनहर, भर भर अति उर हरख भरै

निरखत नर प्रवर प्रवरगण निरझर, निकट मुकुट सिर सवर नमै।
.
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।1



झणणणणण झणण खणण पद झांझर, गोम घणा गणणणण गयणै।

तणणण बज तंत ठणणण टंकारव,रणणण सुर धणणण रयणै।

त्रह त्रह अति त्रणण ध्रणण बज त्रासा,भ्रमण वत रमण भ्रमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।2





झट पट पर उलट पलट नटवत झट, लट पट कट घट निपट ललै।

कोकट अति उकट गति धुन कट, मन डरमट लट लपट मलै।

जमुना तट प्रगट अमट अट रट जूट, सूर पट खेखट तेण समै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।3


धमंधम अति धमक ठमत पद घूमर,धमधम फळ सम होत धरा।

भ्रम भ्रम वत विषय परिश्रम व्रत भ्रम, खमखम दम अहि विडुम खरा।

गम गति अति अगम निगम न लहत गम, नटवत रमझम गम मन में।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।4


गत गत पर ऊगत तूगत नृत प्रियगत, रत उनमत चित वधत रति।

तत पर घ्रत नचत उचत मुख थैथत, आब्रत अत उत भ्रमत अति।

धिधितत गत वजत मृदंग सुर उपजत, कृत भ्रत नर तम अतंत क्रमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।5


ढल ढल रंग प्रगल अढल जन पर झल,झल अल कल तेज झरै।

खलखल भुज चूड़ चपल अति खमकत, कान कतोहल प्रबल करै।

वलवल गल हस्त तु मल चल चितवल, जुगल जुगल प्रति रंग भरै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।6


सरवस वस मोह दरस सुरथित शशि, अरस परस त्रस चरस अति।

कसकस पट हुलस विलस चित आकृष, रस बस खुश हस वरस रति।

ट्रस नव रस सरस भयो ब्रह्मानंद, अनरस मनस तरस अधमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।7





रचियता :- ब्रह्मानंद  स्वामी (लाडुदान गढवी)

।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।

 दर्योधन भरी दुरमत ,

खीजत सारी खांच ।

दीन पुकारै द्रोपदी

पांडव बैठा पांच ।

"नाग दमण" भुजंगप्रयात




।। छंद  मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।


पांच पती बिच लाज पछाड़त ,

 दी वचनां बध दानव धारी ।

खींचत चीर सभाय खचाखच ,

 दौपद को कुण दै दिल दारी ।

कौरव काळ भयो किण कारण ,

नारण आगळ कूकत नारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(१)




हेरत लाज जुऐ मिज हारत ,

 प्रीतम कोण बणै पतधारी ।

कौरव क्रोध कियो जब कायम ,

कोय न लागत है अब कारी ।

भीषम भाव भयो भय भीषण ,

है न विभीषण ना हितकारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी।(२)


 खेद मती दुरियोधन खेलत ,

सायब देखत खीचत सारी । 

हालत हीन दुराचर हींसत ,

पींचण पाप पगो पग पारी ।

द्रोपदि धीर अधीर दुसाशन ,

ना सत छौड़त नासत नारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(३)



पांडव दाव बधैं सब पांखड ,

हो सकुनी धत हीमत हारी ।

पांच पती अब है पछतावत ,

लानत दैकर जो ललकारी ।

साच छुटे छिटके सत सायब ,

नाविक कोण बणै निरधारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(४)


पीर परी गिरधारिय पारत ,

लानत तोड़ करो ललकारी ।

हे बलदेव बधूं बन हीमत ,

बेनड़ काज बणो बलधारी।

कूक सुणी जब कान कड़ाकड़ ,

खोट लगी दुरयोधन खारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(५)


चीर बढ़ाकर चेन चुराकर ,

दी ललकार दु सासन धारी ।

हीमत हार हतास कियो हठ ,

सींचत चीर बढी बहु सारी ।

द्रौपद काज ख्याल रखे दिल ,

दीन दयाल दिवी दिलदारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी।(६)


अम्ब उसी पल आ अवतारित ,

सींचत जैम बढ़ी बहु सारी ।

पारण पार प्रभू पत पैखत ,

दीसत ना उथ दानव चारी ।

भाव सचै भगवान भजो तुम ,

प्रीत तहां रखसी पतधारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(७)



          ।। छप्पय ।।

द्रौपद तणी दहाड़ , हाजिर हुओ हितकारी ।

दैण दुसाशन दाद ,पाळौ पुगो पतधारी ।

खींचताण खूंखार , सत पत बढाई सारी ।

पंचाळी सुण पुकार , गौरव बणै गिरधारी ।

सत अम्ब रखे नित सांवळौ , पंचाळी चीर पुरयो ।

करुणा द्रोपदी करे कृष्ण, धर्म सत गीता धरयो ।

आम्बदान जवाहरदान देवल आलमसर 


छन्द रेणकी- कवि कान जी गांगड़ा

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छन्द रेणकी- कवि कान जी गांगड़ा



मळया आय मिथिलापुरी , भूतळरा के भूप !!

गर्व सकळ रा गाळिया , राघव कुळरा रुप !!१!!

धनुष धरण जब तुं धस्यो , लौचन अरूण लिलाट !!

पद चंपत पगनेश , डग दीसा डणणाट !!२!!


डणणणणण दीस दिग्गज सह डणकत भणण खणण ब्रह्मांड भयो :

गणणणणण गहर गुहागिरी गणकत ठणण ठणण टंकार थयो :

कणणण लंक नृपाळ कणंकत गणण गणण शीर मुगट ग्रीयो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!१!!


कड़ड़ड़ड़ड़ व्योम गोम पड़ कड़कत अड़ड़ अड़ड़ समुदर उछळं :

थड़ड़ड धाम छोड़ खळ थड़कत धड़ड़ धड़ड़ धर नमत ढळं :

गड़ड़ड़ड़ चंद्र लोक लग गड़गड़ फड़ड़ फड़ड़ हय फांण फर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!२!!


कटकटकट सपट झपट फटफट थट खटखट झटपट उलट झटयो :

भटभटभट भटक भटक भय भटभट फटक फटक मनु व्योम फटयो :

घट घट घट अमट अर्यां गभरावट हटहटहट खळदळ हहर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!३!!


झक झक झक नमक रमक झणकारव दमक चमक हर ध्यांन खुले :

छकछक मद अछक अछक्के तक तक भटक भटक भट खटक भूले :

 हकबकहिय सठक गठकटक नाटक फटक फटक थक थक फफर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!४!!


खळभळ अळ प्रबळ प्रबळ तळ पातळ खळखळ कळ बळ अकळ खसे :

डळडळडळ डळत ढळत भुदरसर तळतळ थळथळ सभड़ त्रसे :

झळ झळ झळ झळकझळक कर झळकत खळकखळक सुर कुसुम खर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!५!!


सगवगनग अडगअडग चगचगचग जगजगजग रणंकार जग्यो :

टगटगटग टगर मगर खगखगखग छगछग रग पग अछग छग्यो :

फगफगफग विलग विलग मगडगडग नगनग भग सुरराज नर्यो :

 धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!६!!


खररर अपर अपरं वरधर पर पर धरधर पर अमर पर्यो :

झररर सरर सरर झट झांझर सुरपर परहर सकर सर्यो:

कर कर कर जयति कौशीककर धर धर हर धनु सधर धर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!७!!


सत सत कृत अमत श्रवत दशरथ सत रजत रजत सुर प्रमुद रह्यो :

ध्रत ध्रत ततकाल हारगल सीतरत गत मत रत गुर चरन ग्रह्यो :

क्रत क्रत अत कांन दांन नीज क्रत दत भजत भजत भव पार कर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!८!!


कळस छन्द छप्पैया

धर्यो धनुष रणधीर , वीस्मय घणा विदार्या :

धर्यो धनुष रणधीर , ताप मुनि गणरा टाळ्या :

धर्यो धनुष रणधीर लंक रोळण खग लीधो :

धर्यो धनुष रणधीर , काज अमारो वड कीधो :

धर्यो धनुष ब्रह्मांडधर ,धरण भार भूवरो हसी :

चित वृथा कान सुरभिय चहे चण सारूं लेवा असी !!१!!


वढियार धरा के रत्न कवि कान गांगड़ा कृत छन्द रेणकी

माता जी रा छंद मावलजी वरसडा



दूहा
karani mata


चाळराय रे ज़ाऴरी,झाली सेवक झंब ।
दिन वळियो,टळियो विघन,आंगण फळियो अंब ॥१॥


कुंभ बोलाडण कारणै,मावल करियो मन्न ।
आमंत्रण सुण आवजो, सातां बहऩां सत्थ॥२॥


नवदुरगानां निमंतरां,नवदुरगानां निमंतरां नवलाख।
होड क्रोड हरकत हुवे,हिंगऴाज रथ हांक ॥३॥


देहसे जंजीरां रोक दुःख, परा बेडी खऴ पेच ।
बाऴक तेडी आवजे, नेडी चाऴकनेच ॥४॥


घंट रमण लागो घुमण,नवमुख किया निहाल ।
माई विराजै उभट,सहुवांणी सुभ भाऴ ॥५॥


छंद

सुभ भाळक देव,संभाळक सेवग, झाऴ बंबाळक रोष झडै ।
विकराळक सिंह चडै बिरदाळक ,खेतरपाळक अग्र खडै ।
चख नक्ख सरुप रचै चिरताळक दांणव गाळक शुंभ दयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥१॥


रण ताळक,झाळ शत्रां शिर राऴक कै महिपाऴक सेव करै ।
चमराळक शीश ढुऴाळक चौसठ तेज उजाऴक भांण तरै।
अकडाऴक घाट घडाऴक ओपत थाट थडाऴक आंण थयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥२॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


भरळक्क त्रिशूऴ, बणै अंग भूषण,कोर जरी परऴक्क किये ।
नचता खरळक्क पगां बजै नेवर,हारनगां हरऴक्क हिये ।
परळक्क पहेप का फुल झडै मुख,तेज रवि झरळक्क तयो‌।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥३॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चट पट्ट पटंबर पेहर चोसठ,नाच अघट्ट अमट्ट नचै ।
अट मट्ट मुगट्ट धरै शिर उपर,रास सुभट्ट प्रगट्ट रचै ।
झणणट्ट सुघट्ट बजै पग झांझर,थाट थडां थणणट्ट थयो
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥४॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


धंम धंम नचै धंम धंम बजै,धर जेवर पे ठम ठंम नथां।
नमनंम भवानीय चामुंड नाचत है डमरु डमडंम हथां ।
चम चंम आभुखण अंग चमंकत भांण उदैगिरी जांण भयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥५॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


नमकै ढमकै ठमकै पग नुपूर,चूड भुजां दमकै, चमकै ।
चमकै दुह कुंडळ कानन का,छत्र छागळिया रमकै छमकै।
समकै सिंदुर री रेख संवारत भाऴ कंकु अभकै भरियो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥६॥
 देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चलतां ललकार हिलोमिल चोसठ,हाक भेरु हलकार हसै।
नचतां भलकार वळोवळ नाचत,लाल चुडी मलकार लसै।
तिलकां झिलकार करै पलकां तिस प्रेत मुखां बल्लकार पयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥७॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चंड-मुंड घमंड विखंड के चामुंड,नव खंड-अरु ब्रहमंड ऩमै।
परचंड हुडंड भुडंड प्रखंडज तुंड मुंडा गऴमाऴ तमै ।
झुंड जोगण थुंड उभंड झटोझट,खंड-रु-चंड -व्रहंड-खयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥८॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


खळ-थोगण-थोग-अरोगण खुपर,छेडत जोगड जोश छिलै।
मद भोगण,मांस अरोगण,मैमत,घाव त्रमोगण दैत घिलै।
अंग-रोग-ना-भेट सकै अरु-औगण,क्रित अमोगण रीत कयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक, जोगण चाळक नेच जयो॥९॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


बज डाक,त्रंबाक,ध्रबांक-त्रिशूऴ-व्है,हांक चंडी नवलाख हमै।
पड-ध्राक-नरां-चड-चाक प्रथी पर,नाक-सुरां-असुरांक-ऩमै।
मद-छाक,ऎराक-पियाक-हमै-सई-लो-बकराक-कराय लियो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो॥१०॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


झणणाट बजै,नचतां पग नेवर,व्योम-डंका गणणाट बजै ।
खफरां खणणाट हुवै रत खावण,छोळ रतरां छणणाट छजै ।
नचतां छणणाट पगां बज ऩेवर छत्र-छटा छणणाट छयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥११॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


ब्रहमाणीय,वाणीय,वेद वंचाणीय,जाणीय, मांनीय,चार-जुगों।
असुरांणीय,घांणीय,मार उडाणीय,खेल भवांनीय,मेल खगों ।
शगतांणीय बो बहऩां सह-सांतूय नाच रुद्रांणीय घाट नयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१२॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चाऴराय-सहाय,वधायसु चारण,गाय बजाय रिझाय गुणों।
सुर राय, नमो महामाय,सुरांपत,खाय-खऴां खुफ्र-बाज खणो।
गढ गांव देराय ,चढाय गजां पर,आद भवांनीय साय अयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१३॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


बुधिवांन निधान समो बलवाऩ है,थापनां थांन सुथांन थपं।
मेरवांण हुवो सुभ यान मया जांण जुगांण जहांण जपं।
महादांन ब्रदांन ब्रवै मन 'मावल' चैन सदा अनुमांन चह्यो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१४॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


छाप्पय

जात चाऴ-कनै जाय,आस कर कवियण आवै।
प्रथम दरस्सण पाय,पात नवे निधि पावै।
नमो आदि-अन्नादि,नमो मां चाऴक-नेची।
गुण गांवां हिंगोळ, रवेची,थुं डुंगरेची।
कोहेला शिखर सरसी कऴा,गढ-दांते अंबा गणी ।
शगत मात अरजी सुंणों,जिकां विरदां जोगणी॥१॥

कवि चन्द वरदाई कृत जवलामुखी री स्तुति

चिंता विघन विनाशनी, कमलासनी शकत्त।

वीसहथी हॅस वाहनी, माता देहु सुमत्त॥1

 









                        छन्द भुजंगप्रयातम्

 

नमो आदि अन्नादि तूंही भवानी।

तुंही जोगमाया तूंही बाक बानी।

तुंही धर्नि आकाश विभो पसारे।

तुंही मोह माया बिखे शूल धारे॥1

 

तुंही चार वेदं खटं भाष चिन्ही।

तुंही ज्ञान विज्ञान मै सर्व भीनी।

तुंही वेद विद्या चऊदे प्रकाशी।

कला मंड चोवीस की रूप राशि॥2

 

तुंही रागनी राग वेदं पुराणम।

तुंही जन्त्र मे मन्त्र में सर्व जाणम।

तुंही चन्द्र मे सूर्य मे एक भासै।

तुंही तेज में पुंज मै श्री प्रकाशै॥3

 

तुंही सोखनी पोखनी तीन लोकं।

तुंही जागनी सोवनी दूर दोखं।

तुंही धर्मनी कर्मनी जोगमाया।

तुंही खेचरी भूचरी वज्रकाया ॥ 4

 

तुंही रिद्धि की सिद्धि की एक दाता।

तुंही जोगिनी भोगिनी हो विधाता।

तुंही चार खानी तुंही चार वाणी।

तुंही आतमा पंच भूतं प्रमाणी॥5

 

तुंही सात द्वीपं नवे खंड मंडी।

तुंही घाट ओघाट ब्रह्मंड डंडी।

तुंही धर्नि आकाष तूं बेद बानी।

तुंही नित्य नौजोवना हो भवानी॥6

 

तुंही उद्र में लोक तीनूं उपावे।

तुंही छन्न में खान पानं खपावे।

तुंही एक अन्नेक माया उपावे।

तुंही ब्रह्म भुतेष विष्णु कहावे॥7

 

तुंही मात हो एक ज्योती स्वरूपं।

तुंही काल महाकाल माया विरूपं।

तुंही हो ररंकार ओंकार बाणी।

तुंही स्थावरं जंगमं पोख प्राणी॥8

 

तुंही तूं तुंही तुं तुंही एक चण्डी।

हरी शंकरी ब्रह्म भासे अखण्डी।

तुंही कच्छ रूपं उदद्धी बिलोही।

तुंही मोहिनी देव दैतां विमोही॥9

 

तुंही देह वाराह देवी उपाई।

तुंही ले धरा थंभ दाढां उठाई।

तुंही विप्रहू में सुरापान टार्यो।

तुंही काल बाजी रची दैत मार्य॥10

 

तुंही भारजा इंद्र को मान मार्यो।

तुंही जाय के भ्रग्गु को गर्व गार्यो।

तुंही काम कल्ला विखे प्रेम भीनी।

तुंही देव-दैतां दमी जीत दीनी ॥11

 

तुंही जागती जोति निंद्रा न लेवे।

तुंही जीत देनी सदा देव सेवे।

अजोनी न जोनी उसासी न सासी।

न बैठी न ऊभी न पोढ़ी प्रकासी॥12

 

न जागे न सोवे न हाले न डोले।

गुपत्ती न छत्ति करंति किलोले।

भुजाळं विशालं उजाळं भवानी।

कृपालं त्रिकालं करालं दिवानी॥13

 

उदानं अपानं अछेही न छेही।

न माता न ताता न भ्राता सनेही।

विदेही न देही न रूपा न रेखी।

न माया न काया न छाया विषेखी॥14

 

उदासी न आसी निवासी न मंडी।

सरूपा विरूपा न रूपा सुचंडी।

कमंखा न संखा असंखा कहानी।

हरींकार शब्दं निरंकार बानी ॥15

 

नवोढा न प्रौढा न मुग्धा न बाली।

करोधा विरोधा निरोधा कृपाली।

अभंगा न अंगा त्रिभंगा न जानी।

अनंगा न अंगा सुरंगा पिछानी ॥16

 

शिखर पै फुहारो असो रूप तोरो।

अजोनी सुपावों कटे फंद मोरो।

पढ़े चंद छन्दं अभै दान पाऊं।

निशा वासरं मात दुर्गे सुध्याऊं॥17

 

सुनी साधुकी टेर धाओ भवानी।

गजं डूबते ही ब्रजंराज जानी।

भजे खेचरी भूचरी भूत प्रेतं।

भजे डाकिनी शाकिनी छोड़ खेतं।॥18

 

पढे जीत देनी सबै दैत नाशं।

भजे किंकरी शंकरी काल पाशं।

भजे तोतला जंत्र मंत्रं बिरोळे।,

भजे नारसिंगी बली बीर डोले॥19

 

निशा वासरं शक्ति को ध्यान धारे।

सु नैनं करी नित्य दोषं निवारे।

करी वीनती प्रेमसो भाट चंदं।

पढ़ंते सुनंते मिटे काल फंदं ॥20

 

तुंही आदि अन्नादि की एक माया।

सबे पिण्ड ब्रह्मांड तुंही उपाया।

तुंही बीर बावन्न वंदे सुभारी।

तुंही वाहनी हंस देवी हमारी॥21

 

तुंही पंच तत्वं धरी देह तारी।

तुंही गेह गेहं भई शील वारी।

तुंही शैलजा श्री सावित्री सरूपी।

तुंही शिव विष्णू अजं थीर थप्पी ॥22

 

तुंही पान कुंभं मधुपान करनी।

तुंही दुष्ट घातीन के प्रान हरनी।

तुंही जीव तूं शिव तूं रीत भर्नी।

तुंही अंतरीखं तुंही चीर धर्नी॥23

 

तुंही वेद में जीव रूपं कहावे।

निराधर आधार संसार गावे।

तुंही त्रिगुणी तेज माया लुभाणी।

तुंही पंच भूतं नमस्ते भवानी ॥24

 

नमोॐकार रूपे कल्यानी कमल्ला।

कलारूपं तूं कामदा तूं विमल्ला।

कुमारी करूणा कमंख्या कराली।

जया विज्जया भद्रकाली किंकाली॥25

 

शिवा शंकरी विश्व विमोहनीयं।

वराही चामुण्डा द्रुगा जोगनीयं।

महालच्छमी मंगला रत्त अख्खी।

महा तेज अंबार जालंद्र मख्खी ॥26

 

तुंही गंग गोदावरी गोमतीयं।

तुंही नर्मदा जम्मना सर्सतीयं।

तुंही कोटि सूरज्ज तेजं प्रकाशी।

तुंही कोटि चंदाननं जोत भासी॥27

 

तुंही कोटिधा विश्व आकाश धारे।

तुंही कोटि सुमेरू छाया अपारे।

तुंही कोटि दावानलं ज्वालमाला।

॥तुंही कोटि भयभीत रूपं कराला ॥28

 

तुंही कोटि श्रृंगार लावण्यकारी।

तुंही राधिका रूप रीझे मुरारी।

तुंही विश्व कर्ता तुंही विश्व हर्ता।

तुंही स्थावंर जंगमं में प्रवर्ता ॥29

 

द्रुगामां दुरीजन्न वंदे न आयं।

जपे जाप जालंदरी तो सहायं।

नमस्ते नमस्ते सु जालेन्द्र रानी।

सुरं आसुरं नाग पूजंत प्रानी ॥30

 

नमोंकार रूपे सु आपे बिराजे।

क्लींकार ह्रींकार ॐकार छाजे।

ओहंकार देवी सोहंकार भासं।

श्रियंकार हूंकार त्रींकार वासं॥31

 

तुंही पातकां नाशनी नारसींगी।

तुंही जोगमाया अनेका सुरंगी।

तुंही तूं ज जाने सु तोरो चरीतं।

कहां में लखों चंद तोरी सुक्रीतं ॥32

 

अपारं अनंतं जुगं रूप जानी।

नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी।

नमो ज्वाला ज्वालामुखी तोहि ध्यावे।

अभय सिघ्र वरदान को चंद पावे॥33

 

कहांलो बखानूं लघू बुद्धी मेरी।

पतंगी कहा सूर साम्हे उजेरी।

रति है तुम्हारी मति है तुम्हारी।

चिति है तुम्हारी गति है तुम्हारी॥34

जुगं हाथ जोरी कहे चंद छंदं।

हरो भक्त के दुःख आनंदकंदं।

हिये में बिरजो करो आप बानी।

नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी॥35

 

दोहा:

 

करि विनती यूं बंदिजन, सनमुख रहो सुजान।

प्रकट अम्बिका यूं कहयो, मांग चंद वरदान ॥1

 

छप्पय:

 

जयति जयति जग मात,जयति कारण सब करणी।

जयति भरण भंडार,जयति तारण भवतरणी।

जयति बुध्धि गुरुदेव,दत्त वायक वरदाई।

जयति आद अन्नादि,पींड ब्रहमांड उपाई।

अवलोक लोक साधत अखिल,करणी असुर वध कालिका।

रहो मोहि सहाय सब ठौर पर,जय जग चंडी ज्वालिका॥1

 

आदि अगम अवतार,दैत महिषासुर दरनी।

आदि अगम अवतार,कैटभ मधु भच्छण करणी।

आदि अगम अवतार, रगत शिर रहै रग्गदर।

आदि अगम अवतार, खळण दळ दळ्या खग्गधर।

सुर नर असुर साधंत नित,करणि दुष्ट वध कालिका।

रहो मो सहाय रणखेत मह,जय जग चंडी ज्वालिका॥2

 

शेषनाग साधंत,जपै उर आठौ जामहि।

अरक चंद्र उडुमाळ,नित्त सुमिरै गुण ग्रामहि।

ब्रह्मा विष्णु महेश, सिध्ध चारण सुरराई।

अहरनिशा सुर असुर,आपरी करत वडाई॥

ब्रह्मांड अखिल व्यापक शकति,करणि हरणि प्रतिपालिका।

कर जौरि चंद कवि उच्चरै, जय जग चंडी ज्वालिका॥3

दोहा:

 

कवि चंद रण खेत मै जबहि लरन को जाय।

तब आराधै शक्ति को, मंडै तत्व उपाय॥1

नागणी छंदः

 

रिध्धि दे, सिध्धि दे, अष्ट नव निध्धि दे, वंश मै वृद्धि दे ,बाकबानी।

ह्रदयमें ज्ञान दे, चित्तमें ध्यान दे, अभय वरदान दे, शंभुरानी।

दुःख को दुर कर,सुख भरपुर कर,आश संपुर कर दास जानी।

सज्जन सों हित दे,कुटुम्ब सो प्रीत दे,जंग मै जीत दे मां भवानी ।।