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*चारणी शिव तांडव*

शिवरात्री ना महा पर्व ना दिवेसे भगवान शिवनी वंदना करतो*

*चारणी शिव तांडव*




.     🍃     *|| शिव अष्टपदी  ||*  🍃
.    *रचना : जोगीदान गढवी (चडिया )*
.          *छंद : अष्ट पदी नाराच*

डिमडिमाक डिमडिमााक डिमडिमाक डम डमा
बजंत डाक शिव का धरा पडांय धम धमा
तणंत  घोम तिरहूरा त्वरीत्त वेग लै तमा
उठंत नाद घोर त्राड प्हाड देत पड़ घमा
धगंत लाल लोचनाय तेज सूर टमटमा
अनाधी देव ईश तुं निकुल्ल नाथ निरगमा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||01||,

चडे चबांन चारणांय छंद शी करी छटा
कीया प्रकट्ट काळशाय जड्धरा खुली जटा
धडं धडा धडक धडक धरा धमंक घुर्जटा
कडड थडड फडड फटाक फेण शेष का फटा
किलक्क किलक्क भेरूकाळ बोलतोल बंम्बमा
नटाट रंग नाच शुं  सकंभरी करे समा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||02||


राजिया रा दूहा

धरा पडंत गंग धार धोध शीश पे धर्यो
खुली जटा लटा कटाय भद्र विर सुं भर्यो
फरर फरर फरर फड़ाक फेर फूरदडी फर्यो
हर्यो है दक्ष हाम धाम ठाम ध्वंस के ठर्यो
डडम् डडम् डडम् डडम्ब डाक बोल डमडमा
ततत्त् ताक थाक थैय नाट राज ना थमा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||03||

बबंम्ब बबंम्ब बंम्ब बंम्ब बंम्ब नाद बज्जीया
शिवंम प्रकट्ट संग विर सैन्य प्रेत सज्जीया
हडड हडड हडड हुकंत भूत नाथ भज्जीया
कीये भ्रकुंड नैंण काळ रुप क्रोध कज्जीया
अघोर घोर नाद मे चले फुकंत चिल्लमां
कपोल कांघ शिश कट्ट भूत प्रेत सा भमा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||04||

घुमी उमड घुमड जटा घने घुमंड घोरीयां
गड़ड हड़ड कड़ड कड़ेड फट्ट आभ फोरीयां
सुट्यो सड़ाफ डांफ नंदी हांफ राव होरीया
धमा धमाक देत धींह धाक दक्ष धोरीयां
जली सती अती कलीक् काळ हाड कमकमा
बजंत पाय पयजणां छनन छनन छमा छमा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||05||

दीयंत त्राड प्हाड फाड़ पांण भौम जा पडा
करंत शिव काल कोप जोप धोप जोगडा
दीखंत्त रौद्र रुप दक्ष तांडवम तडम तडा
भगे कहां भवां पिताय जग्ग राह नव जडा
थरर थरर थरर थयल्ल काय ध्रुज कमकमा
मनस्वी पुत्र ब्रह्म मान नाथ पाव मे नमा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||06||

।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।


खडड भडड खड्यो खलक्क खंड द्विप खंडीया
जली कहंत जोगडो चिता विहीन्न चंडीया
रुके न रौद्र रुप शीश मुंड काट मंडीया
भ्रकुंडी नाथ भोळीयाये दक्ष राज दंडीया
हरी गये हरर तदे तमस्वी देख कर तमा
चल्यो हे चक्र वक्र हस्त देह टुक्क कर दमा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||07||

विसो खटा खटा विसोय पिंड देह परगमा
सति हती हती नती य झीक नेंण से झमा
हयात हिम जोड्य हाथ शिस झुक्क के क्षमा
सती पति जपे जती अरप्पीयुं  सूता उमा
करत्त सेव देव हेव रंज मन्न नई रमा
पवित्त चित्त हीत्त मात पार वत्तीयां पमा
प्रचंड जोम जड़ घराय जोगीदांन को जमा
जीभे करंत हे रमा खमा खमा खमा खमा..||08||


आजाद भारत के घोटाले

हिंगलाज माता छंद नाराच

हिंगळाज माताजी री स्तुति। कविराज बचुभाई (जीवा भाई रोहडिया)

    
hinglaj mata pakistan

         

दोहा

चाहत जिणने वृंद सुर,चारण सिध्ध मुनीन्द्र।
ढूंढत है नित ध्यान मंह,करण सृष्टि सुखकंद॥1॥
मो सम को नंह पातकी,तौ सम कौण दयाळ।
डुबत हुं भवसिंधु मंह,तार जणणी ततकाळ॥2॥
कोटि अकोटि प्रकाश कर,वेद अनंत वे अंश।
जगत जणेता जोगणी, विडारण दैतां वंश॥3

      छंद: नाराच

विडारणीय दैत वंश सेवगाँ सुधारणी।
निवारणी विघन अनेक त्रणां भुवन्न तारणी।
उतारणी अघोर कुंड अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥1॥


रमे विलास मंगळा जरोळ डोळ रम्मिया।
सजे सहास औ प्रहास आप रुप उम्मिया।
होवंत हास वेद भाष्य वार वार विम्मळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥2॥


रणां झणां छणां छणां विलोक चंड वाजणां।
असंभ देवि आगळी पडंत पाय पेखणां।
प्रचंड मुक्ख प्रामणा तणां विलंत त्रावळां।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥3॥


।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।



रमां झमां छमां छमां गमे गमे खमा खमा।
वाजींत्र पे रमत्तीये डगं मगं तवेश मां।
डमां डमां डमक्क डाक वागि वीर प्रघ्घळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥4॥


सोहे सिंगार सब्ब सार कंठमाळ कोमळा।
झळां हळां झळां हळां करंत कान कुंडळा।
सोळां कळा संपूर्ण भाल है मयंक निरमळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥5


राजिया रा सोरठा

छपन्न क्रोड शामळा करंत रुप कंठळा।
प्रथी प्रमाण प्रघ्घळा ढळंत नीर धम्मळा॥
वळे विलास वीजळा झमां झऴो मधंझळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥6॥

 




नागेशरां जोगेशरां मनंखरा रिखेशरां।
दिनंकरां धरंतरां दशे दिशा दिगंतरां।
जपै “जीवो” कहे है मात अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥7॥


रंगभर सुंदर श्याम रमै ( रेणकी छंद )

 रेणकी छंद



सर सर पर सधर अमर तर अनसर,करकर वरधर मेल करै।

हरिहर सुर अवर अछर अति मनहर, भर भर अति उर हरख भरै

निरखत नर प्रवर प्रवरगण निरझर, निकट मुकुट सिर सवर नमै।
.
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।1



झणणणणण झणण खणण पद झांझर, गोम घणा गणणणण गयणै।

तणणण बज तंत ठणणण टंकारव,रणणण सुर धणणण रयणै।

त्रह त्रह अति त्रणण ध्रणण बज त्रासा,भ्रमण वत रमण भ्रमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।2





झट पट पर उलट पलट नटवत झट, लट पट कट घट निपट ललै।

कोकट अति उकट गति धुन कट, मन डरमट लट लपट मलै।

जमुना तट प्रगट अमट अट रट जूट, सूर पट खेखट तेण समै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।3


धमंधम अति धमक ठमत पद घूमर,धमधम फळ सम होत धरा।

भ्रम भ्रम वत विषय परिश्रम व्रत भ्रम, खमखम दम अहि विडुम खरा।

गम गति अति अगम निगम न लहत गम, नटवत रमझम गम मन में।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।4


गत गत पर ऊगत तूगत नृत प्रियगत, रत उनमत चित वधत रति।

तत पर घ्रत नचत उचत मुख थैथत, आब्रत अत उत भ्रमत अति।

धिधितत गत वजत मृदंग सुर उपजत, कृत भ्रत नर तम अतंत क्रमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।5


ढल ढल रंग प्रगल अढल जन पर झल,झल अल कल तेज झरै।

खलखल भुज चूड़ चपल अति खमकत, कान कतोहल प्रबल करै।

वलवल गल हस्त तु मल चल चितवल, जुगल जुगल प्रति रंग भरै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।6


सरवस वस मोह दरस सुरथित शशि, अरस परस त्रस चरस अति।

कसकस पट हुलस विलस चित आकृष, रस बस खुश हस वरस रति।

ट्रस नव रस सरस भयो ब्रह्मानंद, अनरस मनस तरस अधमै।

घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।7





रचियता :- ब्रह्मानंद  स्वामी (लाडुदान गढवी)

।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।

 दर्योधन भरी दुरमत ,

खीजत सारी खांच ।

दीन पुकारै द्रोपदी

पांडव बैठा पांच ।

"नाग दमण" भुजंगप्रयात




।। छंद  मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।


पांच पती बिच लाज पछाड़त ,

 दी वचनां बध दानव धारी ।

खींचत चीर सभाय खचाखच ,

 दौपद को कुण दै दिल दारी ।

कौरव काळ भयो किण कारण ,

नारण आगळ कूकत नारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(१)




हेरत लाज जुऐ मिज हारत ,

 प्रीतम कोण बणै पतधारी ।

कौरव क्रोध कियो जब कायम ,

कोय न लागत है अब कारी ।

भीषम भाव भयो भय भीषण ,

है न विभीषण ना हितकारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी।(२)


 खेद मती दुरियोधन खेलत ,

सायब देखत खीचत सारी । 

हालत हीन दुराचर हींसत ,

पींचण पाप पगो पग पारी ।

द्रोपदि धीर अधीर दुसाशन ,

ना सत छौड़त नासत नारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(३)



पांडव दाव बधैं सब पांखड ,

हो सकुनी धत हीमत हारी ।

पांच पती अब है पछतावत ,

लानत दैकर जो ललकारी ।

साच छुटे छिटके सत सायब ,

नाविक कोण बणै निरधारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(४)


पीर परी गिरधारिय पारत ,

लानत तोड़ करो ललकारी ।

हे बलदेव बधूं बन हीमत ,

बेनड़ काज बणो बलधारी।

कूक सुणी जब कान कड़ाकड़ ,

खोट लगी दुरयोधन खारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(५)


चीर बढ़ाकर चेन चुराकर ,

दी ललकार दु सासन धारी ।

हीमत हार हतास कियो हठ ,

सींचत चीर बढी बहु सारी ।

द्रौपद काज ख्याल रखे दिल ,

दीन दयाल दिवी दिलदारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी।(६)


अम्ब उसी पल आ अवतारित ,

सींचत जैम बढ़ी बहु सारी ।

पारण पार प्रभू पत पैखत ,

दीसत ना उथ दानव चारी ।

भाव सचै भगवान भजो तुम ,

प्रीत तहां रखसी पतधारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(७)



          ।। छप्पय ।।

द्रौपद तणी दहाड़ , हाजिर हुओ हितकारी ।

दैण दुसाशन दाद ,पाळौ पुगो पतधारी ।

खींचताण खूंखार , सत पत बढाई सारी ।

पंचाळी सुण पुकार , गौरव बणै गिरधारी ।

सत अम्ब रखे नित सांवळौ , पंचाळी चीर पुरयो ।

करुणा द्रोपदी करे कृष्ण, धर्म सत गीता धरयो ।

आम्बदान जवाहरदान देवल आलमसर 


--छंद जात रोमकंद--करणी माता रा छंद

karani ji maharaj    


कवि खीमदान बारहठ रचित करणी माता रा छंद।

         -----------दोहा---------        

संकट को हरणी सदा,भरणी जग को भात।

अशरण शरणी आदिका मन रट करणी मात।

       --छंद जात रोमकंद--        

जब मानव जट्टीय कुड़ कपट्टीय,काम निपट्टीय नीच करै।

मरजाद सुमट्टीय लोकन लुट्टीय,पाप प्रगट्टीय भुम परे। 

कय आपस कट्टीय वारन वट्टीय,देख दुषटिय लोक डरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रुप धरयो।

देवी धिय सुधारण रुप धरयो।(1)


जद चारण जातीय खुब दुखातीय, कोय न वातीय लाग करे। 

जस पूत जगातीय आतुर आतिय,प्रेम निभातीय टेम परै।

खित राकस खातीय रीझ दिरातीय,संत सुहातीय काम सरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धीय सुधारण रूप धरयो।(2)


 चित मैह सुँ चारण वंश वधारण,पुत्र निहारण चाह पड़ी। 

भगती किय भारण शकती सारण,घाट उधारण तेण घड़ी।

कुख देवल कारण तो अवतारण,जात सुधारण ताप जरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो। 

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(3)


कद रूप कृपालीय माँ वय वालीय,तेज विधालीय ऐण तरै।

किनीया कुल वालीय भुवाय भालीय,दै मुख गालीय नाह डरै।

ठुवलो दिय ठालीय आय अंतालीय,कालीय पाँण वैकार करयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रुप धरयो।

देवी धिय सुधारण रुप धरयो।(4)


 भुयमी हुय भारण ताहि उतारण,किरत धारण वात कयी।

मद दाणव मारण डील से डारण,ज्ञान प्रचारण आय गयी।

सुय भुवाय सारण पाछ पधारण,हाथ सुधारण दुख हरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(5)


मध आत समाड़िय सांप डसाड़िय,तात जीवाड़िय ऐण तरै।

कज जीत कराड़िय दान दिराड़िय,सेन जीमाड़िय शेख सिरै। 

मयहै घर माड़िय पुत्र रमाड़िय,ज्योत जगाड़िय शोक जरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रुप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(6)


 सुवहो धिन सालीय आतम आलीय,दीन दयालीय भाव दख्यो।

सुत देय सिंगालीय जा दुख जालीय,नित निरालीय पै निरख्यो। 

भय भूपत भालीय शाह संचालीय,पाव पखालीय ओट परयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(7)


 संग देप संचावत ब्याव रचावत,विठु ही चावत भाग्य बड़ै।

ब्रहम च्यार वचावत जांन मे जावत,ख्यात दिरावत रूप खड़ै।

पति पारख पावत माथ नमावत,सावत गोत्र कहै सुधरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(8)


अणदे विच आतीय वैत वरातीय,कोड से खातीय आय कयो।

पुण नाम प्रभातीय वो वण वातीय,रातीय माँ घर मैह रयो।

तणरो पय तातीय घृत करातीय,दुख पड़ातीय नाह डरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(9)


सासरे सुरराईय साठिकै आईय,केलु कराईय कोड किता।

घुर नोबत घाईय मोतीन माईय,जान वधाईय थाल जिता।

दुय एम दुवाईय विछु गंवाईय,त्रास हराईय बोल तरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(10)


 छक न्याय सुछापीय कै दुख कापीय,बैन समापीय दीप बयो।

धण नी जब धापीय बोध वियापीय,प्रही सरापीय खार पयो।

मृत पंथी अमापीय कांत कलापीय,जीवण आपीय आह जरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(11)


अस्थल नवल वसा वण नूँ अल,कूच करनल कल कियो।

बल बीजल को मुख स्याल करै वल,थल सयंकल वास थयो।

पल चार प्रबल वणै शकती पल,हाथल से खल कान हरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(12)


दल बल के बिना रिडमल को देवीय,रावल जांगल आप रच्यो।

वल दीध मंडोवर जीत वलोवल,सावल भूप कवल सच्यो।

जंगड़ु जल डुबत तल जहाजन,तें बल मे पल मांय तरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(13)


देशनोक वसा सुख झोकत देवीय,थोक कुटम्ब भलोक थया।

सुर लोक गयो सुत लाखण को सुण,धोक करै जमलोक गया।

उण ओक विलोकर आतम आणीय,जीवत तो कर शोक जरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(14)


 सिर शेख सड़किय वीज कड़किय,ध्राती धड़किय ध्यान धयो।

दीव्य देह दड़किय आथ अड़किय,लोहड़की झट ओट लयो।

भड़ उद भड़किय जुध जुड़किय,दुष्ट गिड़किय शोभ दरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(15)


जग जांण जोधांण बिकांण घणै जस,दो बलवान राजांण दिया। 

कमधांण घरांण नवांण नृपांकर,दुष्ट अजांण खलां दलीया।

जण जोध सुजांण थपांण विको जीत,भांण कुलां अहसान भरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(16)


मुलतान मंझारिय आप पधारिय,जैल निवारिय शैख जिकै।

मुख्य मोहिल मारिय कालु संहारिय,धारिय तें तिरशुल धकै। 

पत वीक पुकारिय वारमवारिय,काज सुधारिय पार करयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(17)


अंणदै इक जाविय कुप खोदाविय,मोद रखाविय कै मन मे।

खित ऊंच खिंचाविय आध मे आविय,डोर तुटाविय ता दिन मे।

करनल कहाविय नागण थाविय,डोर जुडाविय ते न डरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(18)


अमरो सुत जांणीय गाम मथांणीय,संकट पांणीय मेट सबै।

गड़ नाह गिरांणीय होय न हांणीय,आंणीय फैल न रोग अबै।

थिर थांन थपांणीय पाई पुजांणीय,सो सुख मांणीय तें सुधरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(19)


जुध छापर जावत वीक जीतावत,चोथ संधावत उंठ चंडी।

रथ मोकल रावत सीं जोतरावत,वच्छ जीवावत आप वडी।

परचा परखावत पार न पावत,भोप चांपावत वार भरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(20)


विप भुषण तेवर धाबल सुंदर,चीर सजै जर रूप चड़ी।

पद नुपर नेवर हेम चुड़ी कर,लाल नगां गल हार लड़ी।

झिल कानन झुंबर सो व्रन केशर,आस्य हिमंकर सो उचरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रुप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(21)


देशनोक पुरंदर माँ तोय मँदर,कुंगर शीखर क्रीत करै।

अति ऊँदर अंदर पत्थर ऊपर,संगमरमर खोद शिरै।

महा मुरत ते पर छत्र चमंकर,घंट निरंतर पूज घुरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(22)


 सब जांणीय तुँ ब्रहमांणीय सोहत,रांणीय रद्र त्रिलोक रचै।

कहलाणीय तुँ कमला किनीयांणीय,वांणीय खांणीय जीव वचै।

सत पोन समाणीय पावक पांणीय,काम प्रमाणीय बंब करयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप जरयो।(23)


प्रम रूप तुंहि ब्रह्म रूप तुंहि, भीम रूप तुंहि पुर तीन भजै।

क्रम रूप तुंहि ध्रम रूप तुंहि, श्रम रूप तुंहि जग ने सिरजै।

गुण रूप तुंहि नम रूप सदागत,हिय मोहि भ्रम तुप हरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(24)


 सब काम वणाय अणाय घणो सुख,ईजत मान दिराय अति। 

घण संपत आय सदाय हमां घर,साच रखाय हिंये सुमति।

कव खीम कहाय सहाय करनल,तो शरणै महमाय तरयो।

करणी जग कारण पाप प्रजारण,धर्म वधारण रूप धरयो।

देवी धिय सुधारण रूप धरयो।(25)


           ----दोहा----

तरणी रूप अनेक तुँय,धरणी क्रोड़ धरात।

करणी प्रवाड़ा किया,वरणी जाय न वात। 


देवियाण

छन्द रेणकी- कवि कान जी गांगड़ा

charan sahitya


छन्द रेणकी- कवि कान जी गांगड़ा



मळया आय मिथिलापुरी , भूतळरा के भूप !!

गर्व सकळ रा गाळिया , राघव कुळरा रुप !!१!!

धनुष धरण जब तुं धस्यो , लौचन अरूण लिलाट !!

पद चंपत पगनेश , डग दीसा डणणाट !!२!!


डणणणणण दीस दिग्गज सह डणकत भणण खणण ब्रह्मांड भयो :

गणणणणण गहर गुहागिरी गणकत ठणण ठणण टंकार थयो :

कणणण लंक नृपाळ कणंकत गणण गणण शीर मुगट ग्रीयो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!१!!


कड़ड़ड़ड़ड़ व्योम गोम पड़ कड़कत अड़ड़ अड़ड़ समुदर उछळं :

थड़ड़ड धाम छोड़ खळ थड़कत धड़ड़ धड़ड़ धर नमत ढळं :

गड़ड़ड़ड़ चंद्र लोक लग गड़गड़ फड़ड़ फड़ड़ हय फांण फर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!२!!


कटकटकट सपट झपट फटफट थट खटखट झटपट उलट झटयो :

भटभटभट भटक भटक भय भटभट फटक फटक मनु व्योम फटयो :

घट घट घट अमट अर्यां गभरावट हटहटहट खळदळ हहर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!३!!


झक झक झक नमक रमक झणकारव दमक चमक हर ध्यांन खुले :

छकछक मद अछक अछक्के तक तक भटक भटक भट खटक भूले :

 हकबकहिय सठक गठकटक नाटक फटक फटक थक थक फफर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!४!!


खळभळ अळ प्रबळ प्रबळ तळ पातळ खळखळ कळ बळ अकळ खसे :

डळडळडळ डळत ढळत भुदरसर तळतळ थळथळ सभड़ त्रसे :

झळ झळ झळ झळकझळक कर झळकत खळकखळक सुर कुसुम खर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!५!!


सगवगनग अडगअडग चगचगचग जगजगजग रणंकार जग्यो :

टगटगटग टगर मगर खगखगखग छगछग रग पग अछग छग्यो :

फगफगफग विलग विलग मगडगडग नगनग भग सुरराज नर्यो :

 धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!६!!


खररर अपर अपरं वरधर पर पर धरधर पर अमर पर्यो :

झररर सरर सरर झट झांझर सुरपर परहर सकर सर्यो:

कर कर कर जयति कौशीककर धर धर हर धनु सधर धर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!७!!


सत सत कृत अमत श्रवत दशरथ सत रजत रजत सुर प्रमुद रह्यो :

ध्रत ध्रत ततकाल हारगल सीतरत गत मत रत गुर चरन ग्रह्यो :

क्रत क्रत अत कांन दांन नीज क्रत दत भजत भजत भव पार कर्यो :

धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!८!!


कळस छन्द छप्पैया

धर्यो धनुष रणधीर , वीस्मय घणा विदार्या :

धर्यो धनुष रणधीर , ताप मुनि गणरा टाळ्या :

धर्यो धनुष रणधीर लंक रोळण खग लीधो :

धर्यो धनुष रणधीर , काज अमारो वड कीधो :

धर्यो धनुष ब्रह्मांडधर ,धरण भार भूवरो हसी :

चित वृथा कान सुरभिय चहे चण सारूं लेवा असी !!१!!


वढियार धरा के रत्न कवि कान गांगड़ा कृत छन्द रेणकी

"नाग दमण" भुजंगप्रयात

 *चारण भकत कवि सांयाजी झुला रचित "नाग दमण" 

 


रंगभर सुंदर श्याम रमै ( रेणकी छंद )

kaliya naag daman


दोहा-मंगलाचरण


विधिजा शारदा विनवुं, सादर करो पसाय

पवाडो पनंगा सिरे, जदुपति किनो जाय...१

प्रभु घणाचा पाडिया, दैत्य वडा चा दंत

के पालणे पोढिया, के पयपान करंत...२

किणे न दिठो कानवो, सुण्यो न लीला संघ

आप बंधाणो उखळे, बीजा छोडण बंध...३

अवनी भार उतारवा, जायो एण जगत

नाथ विहाणे नितनवे, नवे विहाणे नित...४


                      ○छंद○


               ॥ भुजंगप्रयात ॥


विहाणे नवे नाथ जागो वहेला ।

हुवा दोहिवा धेन गोवाळ हेला ॥

जगाडे जशोदा जदुनाथ जागो ।

मही माट घुमे नवे निध्धि मांगो ॥...१


जिमाडे जीके भावता भोग जाणी ।

परुसे जशोदा जमो चक्र पाणी ॥

अरोगे अधाये किया आचमन्न ।

कपुरी ग्रहे पान बिडा क्रसन्न ॥...२


लिया सार शृंगार, गोचार लिला ।

करे आजरो जम्मुना, त्रट कीला ।।

सुणे शाम आगम्म उभी सहेली ।

हरेवा  हरेवा  हवेली  हवेली ।।...३


भरे मांग सिंदुर मारग्ग भाळे ।

वहे सामलो व्रज्ज शेरी विचाळे ।।

वहेवार लेवार पिंडार वाळे ।

नवा नेहसुं देह गोपी निहाळे ।।....४


हरि हो हरि हो हरि धेन हांके ।

झरुखे चडी नंदकुमार झांके ।।

अहि राणिया अब्ब्ला झुळ आवे ।

भगवान ने धेन गोपी भळावे ।।...५


इको बेवटे चौवटे आय उभी ।

संभाळी लियो शाम मोरी सुरभ्भी ॥

हुइ नंदरी धेन गोवाळ हेला ।

भिळे वाळवा जाणि श्री गंग भेळा ॥...६


परे नेर नीसार आवे प्रहट्टे ।

त्रिवेणी उलट्टी समंद्र तट्टे  ॥

महं कंध सौधा तणी सोड माथे ।

हरि मंजरी तिल्लक वेण हाथे ॥....७


वाइ वांसळी सिंधळी नाद वातां ।

गले माल गुंजा व्रजं बाल गाता ॥

सबे सामला आमला प्रात सादा ।

जमन्ना तणे नीर आहिर जादा ॥...८


रमे वास मे साथ सुं हेक रागे ।

कहे कीजीये कान्ह भीरु बी भागे ।।

वइकुंठरो नाथ रुडी विचारे ।

किया सारिखा लोक बे बे किनारे ।।...९


पखे पार पिंडार था दोय पासे ।

किया लाकडी कंध गेडी कला से  ।।

घणु गेडी ये गेंद मेदान घेरी ।

घणु घुम्मरी डम्मरी फेर फेरी ।।...१०


झिले आवता उलटे हेक झेरे ।

फिरे राम चोटां करे दोट फेरे ॥

मांझी आंकडो मांझीयो खेल मातो ।

रमे संग गोवाळीया रंग रातो ॥....११


मिले चोट सामो समी दोट माथे ।

हुइ दुध्ध मल्लां तणी होड हाथे ॥

चडावे घणु सांकडे फेर चाडे ।

जमुना तणे नाखियो नीर जाडे ॥...१२


दडु लार कान्हो चडे व्रख डाळी ।

भरी झंप काळीद्रहे नाग भाळी॥

काली नागसुं कान्ह संभाळ केवा ।

लधी जाण त्रुट्यो दधी मच्छ लेवा ॥...१३


मंडयो दुसरो खेल खेलंत माथे।

हरी उतरी बात गोवाळ हाथे ॥

करे त्रीन खंडो न मंडेय कन्ना ।

जुवे धेन घडीक कांठे  जम्मन्ना ॥...१४


जदुनाथ काळी समी बाथ जोडे ।

घणी भोम चाली चडी बात घोडे ॥

उभा गाय गोवाळ झुरंत आरे ।

हहाकार हहकार संसार सारे ॥...१५


सुणे वात आघात माता सनेही ।

जशोदा ढळी कदळी खंभ जेही ॥

सब्बे हे सखी लार हाले सयाणी ।

रहावी विचाळे थकी नंद राणी ॥.....१६


तबे नंदरी नारि आहिर टोळे ।

खडे आपडे हेक हेकां खलोळे ॥

जुवे जोखिता जुथ्थ भेळी जशुदा ।

बपैयो हुवो कान्हवो मेघ बुंदा ॥....१७


बिहुं लोचने नीरधारा वहंती ।

कनैयो कनैयो जशोदा कहंती ॥

कलिंदी तणे आइ लोटंत कांठे ।

गयो जाणि चिंतामणी रंक गांठे ॥....१८


बल्लदेव बुझे दिखावे सुदामा ।

रम्यो शाम ते ठाम जोअंत रामा ॥

लिये जीह दंते नही लीह लोपी ।

उभा गाय गोवाळ झुरंत गोपी ॥....१९


अभे छुट एको करं जास आरा ।

थंभे एम उभो लहे काम थारा ॥

जशोदा नके झंप साधी जमन्ना ।

पहेलो मरे मात हुं तात पन्ना ॥....२०


। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।


अचाणक उभो दरबार आवे ।

मिली नागणी हेक हेका मिलावे ॥

इखे बाल गोपाल पामी अचंभा ।

रही दोवळी नागणी देव रंभा ॥....२१


जपे नागपुत्री क्षत्री रुप जोती ।

महा भद्र जाती तणो कान मोती ॥

पणा सांभळो गात्र पीरा पिछोरा ।

कणां उपरां नंग ओपे कंदोरा ॥....२२


पगे घुघरी शेळ आणंद पुजा ।

गले हार मोती रुले माल गुंजा ॥

बिचे दुलडी हेक चोकी बिराजे ।

जिसो राजवी केहरी नख्ख राजे ॥....२3


बिहु बंध बाजु तणा नंग बांहे ।

मणी नंग हीरा तणी जयोत माथे ॥

अहि नारि जप्पे लही मोल उंची ।

प्रभु रे पहुंचे लट्ट्के पहुंची ॥....२४


सबे सुंदरी मुंदरी देख सोही ।

वळे दाडिमे दंत चोकी विमोही ॥

अधरा अमृतं न जाये अधाइ ।

झिले कुंडला लोल कप्पोल झांइ ॥....२५


इखे नाशिका सग्ग दीपक एरी ।

कळी चंप जाणे लळी लंप केरी ॥

नवे नेह दीरध्ध पंकक्ज नेत्रे ।

सुभा मीन खंजन मृग्गी सवेगे ॥....२६


दुहुं भ्रकुटी उर देखंत दोहे ।

भ्रमे भृंग सुता अली जाण भ्रौहे ॥

अली संकली जाण कीधी अल्लकं ।

तणो  केशरी कस्तुरी तिल्लकं ॥...२७


बंधी चोळमा रंग रंगी बिरंगी ।

सुहे उपरां पाघ खांगी सुचंगी ॥

तवे  नागणी चंद्रीका मोर तेही ।

उपे चोप पाव्वस घट्टा अछेही ॥.....२८


अराहे सराहे घणु अव्वलोके । 

रुंधो नाग लोकां तणो राजलोके ॥

ईसी भागणी कुण जो कुख जायो ।

हिंडोरे हलायो घणो हुल्लरायो ॥...२९


हुइ देवमे रुप देखी हिरन्ये ।

जपे जागसी नाग राखो जतन्ये ॥

ओरो दाखवो बाल होसी अबारो ।

पगल्ले पगल्ले महल्ले पधारो॥....३०


रहो तो घरे दाव दुजा रहावा ।

मोरो घाट वेराट एथी न मावां ।।

चमंके चमंके सबे चित चेती ।

लळे पाय लागी वळे लुंण लेती ।।...३१


सुण्यो रुप वेदे सुपेख्यो सबे ही ।

बडा भागरी नागरी नारि वेही ॥

महामोद आणंद देखे मुरक्की ।

भुलाडी वळी नाथ नाखी भुरक्की ॥...३२


कठा हुत आयो अठे काज केहा ।

ग्रहा भुलियो बापरा साप गेहा ॥

भली नागणी नावियो राह भुलो ।

दियो आपरी लाज आपे दडुलो ॥....३३


खटक्के मुही नागणी बोल खारो ।

प्रभु जागसी मुझ पाछा पधारो ॥

काळी नाग सुं लीजिये वेग काना ।

परो तात सोधे चडे मात पाना ॥....३४


नइ नागणी बोल एसा निकासे ।

वसे रस्सणे डस्सणे विख्खवासे ॥

कहो कोर चंपे रही आवका वे ।

असो बाल देखी दया मोय आवे ॥....३५


हजारां मुखे जागसी नाग होवां ।

न डुलो न छांडे निरध्धार नेवां ।।

महाकाळ काली नको बाल माने ।

पडी बोकडी आज ही वाघ पाने ।।...३६


जाओ नागणी नाग वेगे जगाडो ।

अठे मांडशुं आज दोनु अखाडो ।।

रढी जे असो मात आगे रढाळा ।

चाहिजे नहीं बाळ ऐ काळ चाळा ।।...३७


न दिठो कदेइ न नेत्रे निहाळी ।

कने ही नहीं सांभळ्यो नाग काळी ।।

दरबार काळी तणो मेल डावो ।

खडे जम्मराणा, बिचे लाभ खावो ।।....३८


चालेवा करे सामुहा जुध्ध चाळा ।

वधेरा न थारे अजी बाळ वाळा ।।

खेलीजे रमीजे घणं मात खोळा ।

भरीजे नही आभ सुं बाथ भोळा ।।....३९


जुडेवा जसं नाग काळी जगावे ।

अजां मुख्ख  पै पान री सोड आवे ॥

जो ने देह थारो परस्से सनेहो ।

काली नाग सुं जुध्ध संग्राम केहो ॥...४०


चवां बाळ देखे कशुं काळ छेडे ।

कटक्का अट्ट्का नीह तुझ केळे ॥

दुबाहा दुरंगा दुहाला झुझाला ।

भडां रो नहीं आमळा कुंत भाला ॥...४१


नही हेदळे पेदळे मेघ नददा ।

जुडेवा न को रीण उच्छाह जददा ॥

सचाळा भुजाळा लंकाळा न साथी ।

हठाळा पटाळा दंताळा न हाथी ॥..४२


घुडांरा भंडारा नहीं घाघरट्टा ।

नही घुघरे पाखरे रोळ पट्टा ॥

महा बांह बाजु हजारां न मेख्खी ।

जुडे जीण अंगा नही जीव रख्खी ॥..४३


ठवे हथ्थडा रंग रंगा नठाइ ।

प्रचे पहुंचे लोह मोजा न पाइ ॥

जडे छक्कडी टोप नाही जरददा ।

गुपति न कति न छति न गददा ॥...४४


फिरे डम्मरी सेन नाहीं फरस्सी ।

कचोळी कटारी न कस्सी सकस्सी ॥

टंकारं न भारं अढारं न टंकी ।

विधाणं न बाणं कबाणं न बंकी ॥...४५


न फेरी न भेरी निसाणं न नददा ।

रणं तुर बाजे न घोरे रवददा ।।

नके वाजनां वाय पेयाळ वाइ ।

छणे उफणे रेण रेणा न छाइ ।।...४६


नकु नाखिये खाप खग्गा न राजे ।

बडा रागरी धुनी फोजा न बाजे ।।

गडे नाळ गोळा  न दारु न गाजे ।

वहो होक  होकां नको शोर वाजे ।।..४७


नको हुबके जंत्र छुटे हवाइ ।

त्रंबाळे वडाळे न बाजे त्रिधाइ ॥

थडे बेहडे हुह मातीन थट्टा ।

घुरे जाणं आसाढरी मेह घट्टा ॥..४८


ढलक्के नको ढाल नेजा न धज्जा ।

दिसे मोरली हेक थारे दुभज्जा ॥

आपे उमगे सुरमा एह आरे ।

थतो लोहरो लोह रक्षा न थारे ॥...४९


नहीं सेन सेनाधी इक्को सजाइ ।

लडेसो किसे पुत्र पुछां लडाइ ॥

भणा नागपुत्री जिता मुज भीरे ।

तितां मांहि के को नहीं नाग तीरे ॥...५०


कट्ट्का खगा वाहरां नाग का छे ।

अमा नागणी पतरो झुझ आ छे ॥

बुलाडो जगाडो जुओ जुध्ध बाथे ।

हार्या जीतीआ वात करतार हाथे ॥...५१


अशो आज जे कोण भूलोक आ छे ।

काळी नाग शुं जोध संग्राम का छे ॥

चडे कोण काळी तणी सीम चंपे ।

काळी नाग शुं आज ही कंस कंपे ॥...५२


जळे वृख नीला वहे विख्खझाळा ।

वदन्ने सहस्से वधे व्योम वाळा ॥

बडा श्रंग सीतंग हेमंग वाळा ।

जरी फुंक आगे भरे  टुंक फाळा ॥...५३


अरुठो घणो शाम रुठो अमारो ।

हुसे आकरो ठाकरो झुझ वारो ॥

निजं नारियं वांचीया कंथ नाहं ।

वढे जास वैरी वदे दथ्थ वाहं ॥...५४


पनंगा नरां दाणवा देव पासा ।

तुनां दाखवां आज वेगो तमासा ॥

हमे हेकणी गांठ फेरां हजारी।

नहीं नागणी लाग  थारो लगारी ॥...५५


पुणे नाथ ने झालियो एण पिणो ।

मोरो एह कं काहियो द्रोह मीणो ॥

मुरं जोड होंशी घडी हेक मांहे ।

निजं नागणी बोल खोटो न्र वाहे ॥...५६


जम्मना जपे नागणी छोडी जोरा ।

फुणा फीण नखावसी देख फोरा ॥

जम्मुना भणे नागणी वेण जागी ।

लियो बोलते खोजना लेण लागी ॥...५७


कठे वास मुसाल ढोटो कणीरो ।

वळे ताहरे दुसरो कोण वीरो ॥

अमारे भगत्तां रदे एह ओरा ।

मंडया आभ घेरे धरा वास मोरा ॥...५८


मोरे नंदबावो जशोदा सु माइ ।

भलो नाम छे हेक बलभद्र भाइ ॥

मोरे कंस मामो कहे मुझ मुळे ।

कियो वास नेडो जमुना झकुळे ॥...५९


मनासुं न मुंके घडी हेक मामो ।

सजे सुर उगा समो जुध्ध सामो ॥

मामे मोकली मारवा काज मासी ।

इ ता दिहरो हुं हुतो अप्पवासी ॥...६०


घणां दिहरुं मेलियुं नेम घाते ।

जिमेशां हमे जुजवा भांति जाते ॥

चवे भ्रात माता वने धेन चारो ।

वहे आज ते मांगणी मुज वारो ॥...६१


सुरभ्भी तणी नागणी उंच सेवा ।

गणे अध ओधां खरी खेह ग्रेवा ॥

नकी खेह लागी रही देह नीको ।

तसुं नागणी गायरो चंद टीको ॥...६२


बधा देश दिजे द्विजां वेद बोले ।

नहीं नागणी तेह गौदान तोले ॥

पंचा अमृतं देव आछा पखाळे ।

सबे तीर्थ वासो रहे धेन साळे ॥...६३


सवामण दे दुध उगे सवारो ।

एरी नागणी तोल मोटो अमारो ॥

दंही दुधरी वांच्छना सुखदाही ।

मठो धोळिये धृत खोहा मिलाही ॥....६४


वळे हाथ सु मात आपे विरोळे ।

धृतं पीजिये जाणं नौ नित धोळे ॥

लिये मांगि लुणीं दिये मात लुंदो ।

नख्खमे तिके नागणी बोल बुंदो ॥..६५


अवनी तणो भार ले कंध आयो ।

जोने नागणी ते हुतो धेन जायो ॥

गरा उबका ग्रेह ग्रेही गरब्बी ।

पचासा उते धेन मांही परब्बी ॥...६६


कही सेंकडो कापडो कोर कांही ।

मही मांगणे प्रांमणे धेन माही ॥

खळा होळ नांगोळ कीजे न खेती ।

अमां नागणी आथमी रात एती ॥...६७


पडे लाळ रे धेन ऐ नीर पीधे ।

काळी नाग जागाडिए केण कीधे ।।

पिया तात ने गोत्र थारो पिछाणां ।

बडा गोपरो पुत्र आयो विहाणां ।।...६८


जपे मो दिशा जेम काळी जगाडो ।

अशो छोडिदे  मात सुं भ्रात आडो ।।

हिकारो मिले बाप शुं पुछ होडे ।

सुतो साप जागाडिये केण कोडे ।।...६९


कहे बाप जो सापरी आळ कीजे ।

तवां आविजे जागसी जाम त्रीजे ।।

पछा पापरा नागणी तूं पिछाणे ।

बडे ठाकरे बात बांचे विहाणे ।।...७०


जा तुं बाहिरो को अजे तुं न जाणे ।

निसाणे फणे मीण पाखे न माणे ।।

पिता मात रे उलटयो पककवाने।

मोती री हुइ घुघरी सघ्र माने ।।..७१


दुझे नंदरे धेन नौ लाख दुंणी ।

लला तुं नही ऐह कुदंत लुणी ।।

जहां बोलिजे उपडे बोल जेतो ।

लला लेश लेखो कुणां मीण लेतो ।।...७२


अशो नागणी ऐक नेठाह आणे ।

जके निसरया बोल गजदंत जाणे ।।

वृथा वेण जाणे नके मुझ वाळा ।

पणां ऐकणी वार एकीस पाळा ।।...७३


अमां पंथ खांडा तणी धार आगे ।

लसे आंट मुकया पछे छांट लागे ।।

मोर देख आहीर सुं जाति मांहे ।

खत्री उमही खाणंको खग्गवाहे ।।...७४


खत्री काहेको कंस रे हेत खासी ।

विचे वाट माथे वहे व्रज्जवासी ।।

घरे दुसरे तु बली तात घाटी ।

तदा ताहिरे केथ खत्राटे त्राठी ।।....७५


रुले कंस रे राज प्रवेश पोता ।

तदा नंद रे नेह बल्लभद्र नोता ।।

आवे नागणी मुज बल्लभद्र आगे ।

मिले कंस रा दुत पाणी न मांगे ।।..७६


जोयो नंद रे गेह खत्रोट जागी ।

हवे लागवा शंक त्रीलोक लागी ।।

कहुं नागणी रुप युं बोल काने ।

मिले दादरा मेह तो साच माने ।।...७७


काळी नाग नाथु न जो ऐक मायो ।

जशोदा प्रसु नंदबाबे न जायो ।।

नहीं नागणी लाग थारो नवारे ।

हवे हेकणी गांठ हेरुं हजारे ।।...७८


पवाडां अखाडां पहेला पवाऐ ।

घणो रुंधिओ नीवडे नेट घाऐ ।।

सखी वाद पुजे नहीं शाम तोले ।

बधे बाढतां कोर पाघोर बोले ।।...७९


सुणी जे उखाणो पुराणो सयाणी ।

रुकी जे नही जंगली जट्टराणी ।।

काळी नागरी कांणि राखी न कांइ ।

बकी बोले मुंडी चडावे न बांइ ।।..,८०


धूरां पोखियो थान ने धान ध्रायो ।

वळे मोकळो मालियो लाड वायो ।।

अमो सामहो हे सखी वाद आवे ।

किसुं आपरो मोल आपे करावे ।।...८१


पखे त्रिणि पेढी मने शीख मोरी ।

ऐरो कोण लाजे पखो आव ओरी ।।

नमो ढीट ढोटा चवे नाग नारी ।

हवे जोड तुं सुं हवे वाद हारी ।।....८२


अढंगा कहा बोल जेता अधाये ।

पळुं तेतरा आज तुं ना पसाये ।।

नरों नारि को नागणी नां वियाणी ।

रही वांझणी देव दाणव राणी ।।...८३


नारी गांठियो सुंठ दुजी न खायो ।

जनुनी तुंही हेक हेकोज जायो ।।

आयो नागसुं झुझ लेवा अतागे ।

अडीला हुवा आज पाछा न आगे ।।...८४


वडा भेंच भूपाळ के काळ वाळा ।

खिडे नागसुं केण केवांण खाळा ।।

अही राव ने दावडा ऐह आडा ।

गुणां वेद जोता कही क्रोड गाडा ।।....८५


भुजंगा तणी भेट थारा भुजारी ।

दिसी अंतरा रात छोटी दुजारी ।।

सदा आणीयो नागणी बोल सारो ।

थयो वेद पासे नको वेण थारो ।।...८६


अहि नारि सुं नारि भाखे अनेरी ।

हियारी न जोवे चखे कांइ हेरी ।।

मणे नागणी आपणी हद मांही ।

नरं अम्मरां अस्सरा गम नाही  ।।..८७


पव्वनो न चंदो दडंदो प्रवेशं ।

जठे एहरा गम्म एही अनेशं ॥

सुणे रुप विचार ए तेह सुनी ।

ढोटो रुप मोरारि निव्वाण धुनी ॥...८८


जेता बोल बोले तेता दे संभाळी ।

वच्चने वच्चने दिए द्रढवाळी ॥

न लोटे न त्रासे बिहावुं न बुझे ।

सखी लाल एना त्रिभुवन सुझे ॥....८९


दिखावे कसा नागबाळा  दिवाजा ।

बणी बात साकाबंधी कोय काजा ॥

न माने तु नारी मुरारी निरख्खो ।

पढे सामद्रं जो करख्खा परख्खो ॥....९०


रमा सारखी हे सखी धन्य रेखा ।

व्रहमंड वाळा लहे कोण लेखा ॥

सहस्सां लखी सोळ्से रे समाणी ।

पचासं अभे चत्र दो पट्टराणी ॥...९१


अठासी अभ्यासी दरब्बार आठुं ।

सखी देक बेटा लखं लख साठुं ॥

जनुनी तणो जाण मां एण जायो ।

उतारं हवे भोम चा भार आयो ॥...९२


म जाणे बियां बाळ चक्कचाळ माधा ।

बळीराय जेहा छळे जेण खाधा ।।

जशोदा तणो नंद ए देव जाणो ।

छडेवा गयो आप आपे छळाणो ।।...९३


बळीराज सुं तूठते दाख वाइ ।

प्रतीहार कताॅर में रिध्ध पाइ ।।

समाणी जसुं नागराणी सुणायो ।

अरुठो अतुठो भले काज आयो ।।...९४


उभो मोरली नाद लीधे अधुरे ।

मारो जागशी शाम वादे मधुरे ।।

विकस्से हसे वेण उंचो बजायो ।

सपते पताळे सुरग्गे सुणायो ।।.....९५


वधाइ वधाइ जशोदा वधाइ ।

करे मोरली नाद ठाढो कनाइ ॥

मथे नीर आछो जिंही मच्छ माइ ।

जशोदा किणे कान जित्यो न जाइ ॥....९६


बडा जीतसी जुध्ध बाहु बडाइ ।

गर्गाचार्य नारद संखेप गाइ ॥

रही मोरली धुन बाजी रसाळी ।

वळी चेतना व्रज्जरा साथ वाळी ॥....९७


लुटे साथ जाणे अमीद्वार लीधो ।

किणो वेण नादं सजीवन कीधो ॥

विजोगी संजोगी वजे वेण वायो ।

प्रभु आपरी जाण अमृत पायो ॥....९८


जिसे सिंधवे राग काळी जगायो ।

उपाडे फुणाफार दरबार आयो ॥

फणाकार फण झाटके पुंछ फेरी ।

घणो घातियो सांकडे शाम घेरी ॥.....९९


घेर्यो नंदरो ढोट अहि कोट एहा ।

जळाबोळ जाणे कळा सोळ जेहा ॥

नळी वाटती सामुही झाळ नाखी ।

प्रभु अंग लागी जाणे फुल पांखी ॥....१००


गोपीनाथ रा हाथ आया गड्ड्दे ।

अही गारडी जाण छांट्यो अड्डदे ॥

अही मुंठ वाजीन जेही उपाडे ।

रमे गारडी जेम काळो रमाळे ॥...१०१


जोइ गात्र टोळी मळी नागजादी ।

वढे साप ने शामळो सुरवादी ॥

अभे जग्ग जेठी फरी नीर उडे ।

काळी नागसुं आविओ कान कुंडे ॥...१०२


पेसारा ओसारा खरा पाय कारा ।

लहे नाग लारां नरां नायकारा ॥

मचे मुठ मारा झरे श्रोण धारा ।

फणारां घणारा करे फुतकारा ॥....१०३


उडाडे गळं फेगळारां अंगारा ।

अंधारा झगारा उभे कीध आरा ॥

काना रा करारा खमे हथ्थ थारा ।

उछीरा उधारा वहेवार वारा ॥.....१०४


त्रधारा चोधारा जडे भव्य तारा ।

पाटुरा प्रहारा ढिंका ढिंचणारा ॥

पडे पाव पारा मथे मेण धारा ।

ग्रहे गुंदळे जाण कुंभार गारा ॥...१०५


घुमारा घसारा सहे शाम सारा ।

गड्ड्दा गमारा गडी गुंठणारा ॥

थमे ओज थारा भलो शेष भारो ।

ध्रुजंती धरा रा थरक्के थंभारा ॥....१०६


नहस्से नगारा सरा रां सवारा ।

काळी नाग ने कान झुझे करारा ॥

नाखी नागरी कोपरी शाम हथ्था।

रीया देखवा ठठ सु देव रथ्था ॥...१०७


भरे चुंड चांडा जहे जाड भीडे ।

बहु हाथरी बाथ सुं नाथ बीडे ।। 

जरें हाथ वाळा पडया माथ नीचा ।

पडी सापरी कांचळी सुत्र काचा ।।...१०८


रढे डाढ काढे वढे नाग रीसे ।

वदन्ने वहे श्रोण पंचास बीसे ॥

काळी नाग सुं जुध्ध मातो क्रसन्ने ।

बही जमन्नां पुर सिंदुर व्रन्ने ।।...१०९


कियो आपसुं आप आळोच काने ।

रमे साप खेधाउ सूधो न माने ॥

बिहाले हथाले गुपाले बड्ड्बे ।

जुवे नागणी झाग नांखे जड्ड्बे ।। ११०

" समंवाद(संवाद) काली तणो ऐह सारो

  चवे दास दासांन "सांयो" चितारो "


अही राव ने दाव काहु न सुज्यो ।

असो भीडीयो सांस नासा अळुज्यो ॥

पर्यो मारि प्राणे कियो गोत्र भंगे ।

प्रभु मांडिओ रास माथे पनंगे ॥..१११


तिसी तंत ताती बजी ताल ताळी ।

मंडयो पांव आरंभियो वन्नमाळी ।।

तता थै तता थै तता थै स तानं ।

उरे अंतयं अंजयं सुखमान ।।.... ११२


गिड्ड थो गिड्ड थो गिड्ड थो कं गाजे ।

वाइ वांसळी नाद धौका सुवाजे ।।

काळी नाचियो उपरे नित काळी ।

वळी रंभ नाटा रंभे अंकवाळी ।।...११३


डरे नाग काळी झरे श्रोण डाचे ।

नमो नाथ तों नाच नारद नाचे ।।

पतंगे शिरे नाचियो नाथ पाखे ।

भलो नंद किशोर नारद भाखे ।।....११४


जपी नाथसुं नागणी हाथ जोडी ।

थयो दोष मोटो अमां मत थोडी ।।

तुकारे रिकारे जिकोरे तमासुं ।

आया आज सा माफ कीजे अमासुं ।।...११५


महाखम्मिया नद्द्सुं ब्रद मोटा ।

खरो हेक तुंही बिया सर्व खोटा ॥

जडो रुप तुनां त्रणावंत जेहो ।

कुहाडो त्रणा उपरे मात्र केहो ॥.....११६


लुकाइ वचाळे प्रभु लंक लागे ।

अहेडा सुणां साखरा केथ आगे ॥

सम्ही सेस मांही सुजाइ न सुझे ।

बुका हीणको रावळी गत बुझे ॥....११७


ब्रहमांड एकीस देखी विहांणे ।

जशोदा अजो राज ने पुत्र जाणे ॥

पिता व्रन्नरा पास ही मध्धरावे ।

भजे नंद तुही तवां पुत्र भावे ॥....११८


गाढो रावळो गुण आयो गडुदे ।

हवे गारडी नाग छुट्यो हडुदे ॥

पडि साप री छाप यों राज माथे ।

प्रभु वेदना हो कसी राज प्राये ॥...११९


दियो कंत वेगो हवे वेण दिधो ।

काळी नागरी नारि उच्छाह कीधो ।।

आगे नागणी भेट सम्मेट आणे ।

जदुनाथ लीजें जको राज जाणे ।।.....१२०


उवारे घणा आप आपे अरच्चे ।

चुवे चंदणं काश्मीरी चरच्चे ॥

अही नाथियो पोयणी नाळ आणे ।

अस्सवार आपे हुवे अ पलाणे ॥...१२१


काळी भारियो कम्मलां भारकाने ।

पडयो आय पाताल शुं आप पाने ॥

अस्वार काळी तणो कान आयो ।

विविधं विधी व्रजनारी वधायो ॥....१२२


भग्गवान गोविंद गोपाळ भेळा ।

वडा चित फुले दुजा तेण बेळा ॥

वागे झालियो ब्रज्जशेरी विचाळे ।

वळे फेरिओ आंगणे नंद बाळे ॥....१२३


काळीनाग काळी दुहे हत काढे ।

दियो वास दुरांतकां तुझ डाढे ॥

झरी द्रोह चिंता पडी कंस जंपे ।

काळी कुटीओ टार केंकाण कंपे ॥...१२४


महाकाल काळी तणो माण मोडे ।

जशोदा भणी आवियो पाण जोडे ॥

वाइ नंद रे वेण उच्छाह वाळी ।

कहंता अबुझे ब्रहमा कपाली ॥....१२५


गोविंद दासरे आसरे यश गाया ।

वचंते न पुजे सवेशं सवाया ।।

काळीनाग वाळो सम्मवाद काने ।

पयां पेट नावे पडे तास पाने ।।...१२६


जाणे वो न जायो जमंदुत जाडे ।

पुराणे अढारे कियो बुम पाडे ॥

रस्समै समथ्थै कहयो सन्न मख्खै ।

समवाद गातां ग्रहे पार सख्खे ॥....१२७


समंवाद काली तणो ऐह सारो

चवे दास दासान "सांयो "चितारो ।।...१२७.५


सणे पणे समवाद नंद नंदन अहि नारी

समद्र पार संसार होय गो पद अनुहारी

अनंत अनंत आनंद सबे वपु तास सुहावे

भगत मुगत भंडार कृष्ण मुगताज कहावे

रचियो चरित्र राधा रमण दो भज कन्न काली दमण

चैतवण सुणण गहरा तणा मटण काज आवा गमण 


माता जी रा छंद मावलजी वरसडा



दूहा
karani mata


चाळराय रे ज़ाऴरी,झाली सेवक झंब ।
दिन वळियो,टळियो विघन,आंगण फळियो अंब ॥१॥


कुंभ बोलाडण कारणै,मावल करियो मन्न ।
आमंत्रण सुण आवजो, सातां बहऩां सत्थ॥२॥


नवदुरगानां निमंतरां,नवदुरगानां निमंतरां नवलाख।
होड क्रोड हरकत हुवे,हिंगऴाज रथ हांक ॥३॥


देहसे जंजीरां रोक दुःख, परा बेडी खऴ पेच ।
बाऴक तेडी आवजे, नेडी चाऴकनेच ॥४॥


घंट रमण लागो घुमण,नवमुख किया निहाल ।
माई विराजै उभट,सहुवांणी सुभ भाऴ ॥५॥


छंद

सुभ भाळक देव,संभाळक सेवग, झाऴ बंबाळक रोष झडै ।
विकराळक सिंह चडै बिरदाळक ,खेतरपाळक अग्र खडै ।
चख नक्ख सरुप रचै चिरताळक दांणव गाळक शुंभ दयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥१॥


रण ताळक,झाळ शत्रां शिर राऴक कै महिपाऴक सेव करै ।
चमराळक शीश ढुऴाळक चौसठ तेज उजाऴक भांण तरै।
अकडाऴक घाट घडाऴक ओपत थाट थडाऴक आंण थयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥२॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


भरळक्क त्रिशूऴ, बणै अंग भूषण,कोर जरी परऴक्क किये ।
नचता खरळक्क पगां बजै नेवर,हारनगां हरऴक्क हिये ।
परळक्क पहेप का फुल झडै मुख,तेज रवि झरळक्क तयो‌।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥३॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चट पट्ट पटंबर पेहर चोसठ,नाच अघट्ट अमट्ट नचै ।
अट मट्ट मुगट्ट धरै शिर उपर,रास सुभट्ट प्रगट्ट रचै ।
झणणट्ट सुघट्ट बजै पग झांझर,थाट थडां थणणट्ट थयो
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥४॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


धंम धंम नचै धंम धंम बजै,धर जेवर पे ठम ठंम नथां।
नमनंम भवानीय चामुंड नाचत है डमरु डमडंम हथां ।
चम चंम आभुखण अंग चमंकत भांण उदैगिरी जांण भयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥५॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


नमकै ढमकै ठमकै पग नुपूर,चूड भुजां दमकै, चमकै ।
चमकै दुह कुंडळ कानन का,छत्र छागळिया रमकै छमकै।
समकै सिंदुर री रेख संवारत भाऴ कंकु अभकै भरियो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥६॥
 देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चलतां ललकार हिलोमिल चोसठ,हाक भेरु हलकार हसै।
नचतां भलकार वळोवळ नाचत,लाल चुडी मलकार लसै।
तिलकां झिलकार करै पलकां तिस प्रेत मुखां बल्लकार पयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥७॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चंड-मुंड घमंड विखंड के चामुंड,नव खंड-अरु ब्रहमंड ऩमै।
परचंड हुडंड भुडंड प्रखंडज तुंड मुंडा गऴमाऴ तमै ।
झुंड जोगण थुंड उभंड झटोझट,खंड-रु-चंड -व्रहंड-खयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥८॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


खळ-थोगण-थोग-अरोगण खुपर,छेडत जोगड जोश छिलै।
मद भोगण,मांस अरोगण,मैमत,घाव त्रमोगण दैत घिलै।
अंग-रोग-ना-भेट सकै अरु-औगण,क्रित अमोगण रीत कयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक, जोगण चाळक नेच जयो॥९॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


बज डाक,त्रंबाक,ध्रबांक-त्रिशूऴ-व्है,हांक चंडी नवलाख हमै।
पड-ध्राक-नरां-चड-चाक प्रथी पर,नाक-सुरां-असुरांक-ऩमै।
मद-छाक,ऎराक-पियाक-हमै-सई-लो-बकराक-कराय लियो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो॥१०॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


झणणाट बजै,नचतां पग नेवर,व्योम-डंका गणणाट बजै ।
खफरां खणणाट हुवै रत खावण,छोळ रतरां छणणाट छजै ।
नचतां छणणाट पगां बज ऩेवर छत्र-छटा छणणाट छयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥११॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


ब्रहमाणीय,वाणीय,वेद वंचाणीय,जाणीय, मांनीय,चार-जुगों।
असुरांणीय,घांणीय,मार उडाणीय,खेल भवांनीय,मेल खगों ।
शगतांणीय बो बहऩां सह-सांतूय नाच रुद्रांणीय घाट नयो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१२॥ 
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


चाऴराय-सहाय,वधायसु चारण,गाय बजाय रिझाय गुणों।
सुर राय, नमो महामाय,सुरांपत,खाय-खऴां खुफ्र-बाज खणो।
गढ गांव देराय ,चढाय गजां पर,आद भवांनीय साय अयो ।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१३॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


बुधिवांन निधान समो बलवाऩ है,थापनां थांन सुथांन थपं।
मेरवांण हुवो सुभ यान मया जांण जुगांण जहांण जपं।
महादांन ब्रदांन ब्रवै मन 'मावल' चैन सदा अनुमांन चह्यो।
प्रतपाळक बाळक,रोग प्रज़ाळक,जोगण चाळक नेच जयो ॥१४॥
देवी जोगण चाळक नेच जयो॥


छाप्पय

जात चाऴ-कनै जाय,आस कर कवियण आवै।
प्रथम दरस्सण पाय,पात नवे निधि पावै।
नमो आदि-अन्नादि,नमो मां चाऴक-नेची।
गुण गांवां हिंगोळ, रवेची,थुं डुंगरेची।
कोहेला शिखर सरसी कऴा,गढ-दांते अंबा गणी ।
शगत मात अरजी सुंणों,जिकां विरदां जोगणी॥१॥

कवि चन्द वरदाई कृत जवलामुखी री स्तुति

चिंता विघन विनाशनी, कमलासनी शकत्त।

वीसहथी हॅस वाहनी, माता देहु सुमत्त॥1

 









                        छन्द भुजंगप्रयातम्

 

नमो आदि अन्नादि तूंही भवानी।

तुंही जोगमाया तूंही बाक बानी।

तुंही धर्नि आकाश विभो पसारे।

तुंही मोह माया बिखे शूल धारे॥1

 

तुंही चार वेदं खटं भाष चिन्ही।

तुंही ज्ञान विज्ञान मै सर्व भीनी।

तुंही वेद विद्या चऊदे प्रकाशी।

कला मंड चोवीस की रूप राशि॥2

 

तुंही रागनी राग वेदं पुराणम।

तुंही जन्त्र मे मन्त्र में सर्व जाणम।

तुंही चन्द्र मे सूर्य मे एक भासै।

तुंही तेज में पुंज मै श्री प्रकाशै॥3

 

तुंही सोखनी पोखनी तीन लोकं।

तुंही जागनी सोवनी दूर दोखं।

तुंही धर्मनी कर्मनी जोगमाया।

तुंही खेचरी भूचरी वज्रकाया ॥ 4

 

तुंही रिद्धि की सिद्धि की एक दाता।

तुंही जोगिनी भोगिनी हो विधाता।

तुंही चार खानी तुंही चार वाणी।

तुंही आतमा पंच भूतं प्रमाणी॥5

 

तुंही सात द्वीपं नवे खंड मंडी।

तुंही घाट ओघाट ब्रह्मंड डंडी।

तुंही धर्नि आकाष तूं बेद बानी।

तुंही नित्य नौजोवना हो भवानी॥6

 

तुंही उद्र में लोक तीनूं उपावे।

तुंही छन्न में खान पानं खपावे।

तुंही एक अन्नेक माया उपावे।

तुंही ब्रह्म भुतेष विष्णु कहावे॥7

 

तुंही मात हो एक ज्योती स्वरूपं।

तुंही काल महाकाल माया विरूपं।

तुंही हो ररंकार ओंकार बाणी।

तुंही स्थावरं जंगमं पोख प्राणी॥8

 

तुंही तूं तुंही तुं तुंही एक चण्डी।

हरी शंकरी ब्रह्म भासे अखण्डी।

तुंही कच्छ रूपं उदद्धी बिलोही।

तुंही मोहिनी देव दैतां विमोही॥9

 

तुंही देह वाराह देवी उपाई।

तुंही ले धरा थंभ दाढां उठाई।

तुंही विप्रहू में सुरापान टार्यो।

तुंही काल बाजी रची दैत मार्य॥10

 

तुंही भारजा इंद्र को मान मार्यो।

तुंही जाय के भ्रग्गु को गर्व गार्यो।

तुंही काम कल्ला विखे प्रेम भीनी।

तुंही देव-दैतां दमी जीत दीनी ॥11

 

तुंही जागती जोति निंद्रा न लेवे।

तुंही जीत देनी सदा देव सेवे।

अजोनी न जोनी उसासी न सासी।

न बैठी न ऊभी न पोढ़ी प्रकासी॥12

 

न जागे न सोवे न हाले न डोले।

गुपत्ती न छत्ति करंति किलोले।

भुजाळं विशालं उजाळं भवानी।

कृपालं त्रिकालं करालं दिवानी॥13

 

उदानं अपानं अछेही न छेही।

न माता न ताता न भ्राता सनेही।

विदेही न देही न रूपा न रेखी।

न माया न काया न छाया विषेखी॥14

 

उदासी न आसी निवासी न मंडी।

सरूपा विरूपा न रूपा सुचंडी।

कमंखा न संखा असंखा कहानी।

हरींकार शब्दं निरंकार बानी ॥15

 

नवोढा न प्रौढा न मुग्धा न बाली।

करोधा विरोधा निरोधा कृपाली।

अभंगा न अंगा त्रिभंगा न जानी।

अनंगा न अंगा सुरंगा पिछानी ॥16

 

शिखर पै फुहारो असो रूप तोरो।

अजोनी सुपावों कटे फंद मोरो।

पढ़े चंद छन्दं अभै दान पाऊं।

निशा वासरं मात दुर्गे सुध्याऊं॥17

 

सुनी साधुकी टेर धाओ भवानी।

गजं डूबते ही ब्रजंराज जानी।

भजे खेचरी भूचरी भूत प्रेतं।

भजे डाकिनी शाकिनी छोड़ खेतं।॥18

 

पढे जीत देनी सबै दैत नाशं।

भजे किंकरी शंकरी काल पाशं।

भजे तोतला जंत्र मंत्रं बिरोळे।,

भजे नारसिंगी बली बीर डोले॥19

 

निशा वासरं शक्ति को ध्यान धारे।

सु नैनं करी नित्य दोषं निवारे।

करी वीनती प्रेमसो भाट चंदं।

पढ़ंते सुनंते मिटे काल फंदं ॥20

 

तुंही आदि अन्नादि की एक माया।

सबे पिण्ड ब्रह्मांड तुंही उपाया।

तुंही बीर बावन्न वंदे सुभारी।

तुंही वाहनी हंस देवी हमारी॥21

 

तुंही पंच तत्वं धरी देह तारी।

तुंही गेह गेहं भई शील वारी।

तुंही शैलजा श्री सावित्री सरूपी।

तुंही शिव विष्णू अजं थीर थप्पी ॥22

 

तुंही पान कुंभं मधुपान करनी।

तुंही दुष्ट घातीन के प्रान हरनी।

तुंही जीव तूं शिव तूं रीत भर्नी।

तुंही अंतरीखं तुंही चीर धर्नी॥23

 

तुंही वेद में जीव रूपं कहावे।

निराधर आधार संसार गावे।

तुंही त्रिगुणी तेज माया लुभाणी।

तुंही पंच भूतं नमस्ते भवानी ॥24

 

नमोॐकार रूपे कल्यानी कमल्ला।

कलारूपं तूं कामदा तूं विमल्ला।

कुमारी करूणा कमंख्या कराली।

जया विज्जया भद्रकाली किंकाली॥25

 

शिवा शंकरी विश्व विमोहनीयं।

वराही चामुण्डा द्रुगा जोगनीयं।

महालच्छमी मंगला रत्त अख्खी।

महा तेज अंबार जालंद्र मख्खी ॥26

 

तुंही गंग गोदावरी गोमतीयं।

तुंही नर्मदा जम्मना सर्सतीयं।

तुंही कोटि सूरज्ज तेजं प्रकाशी।

तुंही कोटि चंदाननं जोत भासी॥27

 

तुंही कोटिधा विश्व आकाश धारे।

तुंही कोटि सुमेरू छाया अपारे।

तुंही कोटि दावानलं ज्वालमाला।

॥तुंही कोटि भयभीत रूपं कराला ॥28

 

तुंही कोटि श्रृंगार लावण्यकारी।

तुंही राधिका रूप रीझे मुरारी।

तुंही विश्व कर्ता तुंही विश्व हर्ता।

तुंही स्थावंर जंगमं में प्रवर्ता ॥29

 

द्रुगामां दुरीजन्न वंदे न आयं।

जपे जाप जालंदरी तो सहायं।

नमस्ते नमस्ते सु जालेन्द्र रानी।

सुरं आसुरं नाग पूजंत प्रानी ॥30

 

नमोंकार रूपे सु आपे बिराजे।

क्लींकार ह्रींकार ॐकार छाजे।

ओहंकार देवी सोहंकार भासं।

श्रियंकार हूंकार त्रींकार वासं॥31

 

तुंही पातकां नाशनी नारसींगी।

तुंही जोगमाया अनेका सुरंगी।

तुंही तूं ज जाने सु तोरो चरीतं।

कहां में लखों चंद तोरी सुक्रीतं ॥32

 

अपारं अनंतं जुगं रूप जानी।

नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी।

नमो ज्वाला ज्वालामुखी तोहि ध्यावे।

अभय सिघ्र वरदान को चंद पावे॥33

 

कहांलो बखानूं लघू बुद्धी मेरी।

पतंगी कहा सूर साम्हे उजेरी।

रति है तुम्हारी मति है तुम्हारी।

चिति है तुम्हारी गति है तुम्हारी॥34

जुगं हाथ जोरी कहे चंद छंदं।

हरो भक्त के दुःख आनंदकंदं।

हिये में बिरजो करो आप बानी।

नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी॥35

 

दोहा:

 

करि विनती यूं बंदिजन, सनमुख रहो सुजान।

प्रकट अम्बिका यूं कहयो, मांग चंद वरदान ॥1

 

छप्पय:

 

जयति जयति जग मात,जयति कारण सब करणी।

जयति भरण भंडार,जयति तारण भवतरणी।

जयति बुध्धि गुरुदेव,दत्त वायक वरदाई।

जयति आद अन्नादि,पींड ब्रहमांड उपाई।

अवलोक लोक साधत अखिल,करणी असुर वध कालिका।

रहो मोहि सहाय सब ठौर पर,जय जग चंडी ज्वालिका॥1

 

आदि अगम अवतार,दैत महिषासुर दरनी।

आदि अगम अवतार,कैटभ मधु भच्छण करणी।

आदि अगम अवतार, रगत शिर रहै रग्गदर।

आदि अगम अवतार, खळण दळ दळ्या खग्गधर।

सुर नर असुर साधंत नित,करणि दुष्ट वध कालिका।

रहो मो सहाय रणखेत मह,जय जग चंडी ज्वालिका॥2

 

शेषनाग साधंत,जपै उर आठौ जामहि।

अरक चंद्र उडुमाळ,नित्त सुमिरै गुण ग्रामहि।

ब्रह्मा विष्णु महेश, सिध्ध चारण सुरराई।

अहरनिशा सुर असुर,आपरी करत वडाई॥

ब्रह्मांड अखिल व्यापक शकति,करणि हरणि प्रतिपालिका।

कर जौरि चंद कवि उच्चरै, जय जग चंडी ज्वालिका॥3

दोहा:

 

कवि चंद रण खेत मै जबहि लरन को जाय।

तब आराधै शक्ति को, मंडै तत्व उपाय॥1

नागणी छंदः

 

रिध्धि दे, सिध्धि दे, अष्ट नव निध्धि दे, वंश मै वृद्धि दे ,बाकबानी।

ह्रदयमें ज्ञान दे, चित्तमें ध्यान दे, अभय वरदान दे, शंभुरानी।

दुःख को दुर कर,सुख भरपुर कर,आश संपुर कर दास जानी।

सज्जन सों हित दे,कुटुम्ब सो प्रीत दे,जंग मै जीत दे मां भवानी ।।