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हिंगलाज माता छंद नाराच

हिंगळाज माताजी री स्तुति। कविराज बचुभाई (जीवा भाई रोहडिया)

    
hinglaj mata pakistan

         

दोहा

चाहत जिणने वृंद सुर,चारण सिध्ध मुनीन्द्र।
ढूंढत है नित ध्यान मंह,करण सृष्टि सुखकंद॥1॥
मो सम को नंह पातकी,तौ सम कौण दयाळ।
डुबत हुं भवसिंधु मंह,तार जणणी ततकाळ॥2॥
कोटि अकोटि प्रकाश कर,वेद अनंत वे अंश।
जगत जणेता जोगणी, विडारण दैतां वंश॥3

      छंद: नाराच

विडारणीय दैत वंश सेवगाँ सुधारणी।
निवारणी विघन अनेक त्रणां भुवन्न तारणी।
उतारणी अघोर कुंड अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥1॥


रमे विलास मंगळा जरोळ डोळ रम्मिया।
सजे सहास औ प्रहास आप रुप उम्मिया।
होवंत हास वेद भाष्य वार वार विम्मळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥2॥


रणां झणां छणां छणां विलोक चंड वाजणां।
असंभ देवि आगळी पडंत पाय पेखणां।
प्रचंड मुक्ख प्रामणा तणां विलंत त्रावळां।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥3॥


।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।



रमां झमां छमां छमां गमे गमे खमा खमा।
वाजींत्र पे रमत्तीये डगं मगं तवेश मां।
डमां डमां डमक्क डाक वागि वीर प्रघ्घळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥4॥


सोहे सिंगार सब्ब सार कंठमाळ कोमळा।
झळां हळां झळां हळां करंत कान कुंडळा।
सोळां कळा संपूर्ण भाल है मयंक निरमळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥5


राजिया रा सोरठा

छपन्न क्रोड शामळा करंत रुप कंठळा।
प्रथी प्रमाण प्रघ्घळा ढळंत नीर धम्मळा॥
वळे विलास वीजळा झमां झऴो मधंझळा।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥6॥

 




नागेशरां जोगेशरां मनंखरा रिखेशरां।
दिनंकरां धरंतरां दशे दिशा दिगंतरां।
जपै “जीवो” कहे है मात अर्गला मां अर्गला।
करंत देवि हिंगळा कल्याण मात मंगळा॥7॥


।। छंद मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।

 दर्योधन भरी दुरमत ,

खीजत सारी खांच ।

दीन पुकारै द्रोपदी

पांडव बैठा पांच ।

"नाग दमण" भुजंगप्रयात




।। छंद  मतगंयद सवैया द्रोपदी पुकार।।


पांच पती बिच लाज पछाड़त ,

 दी वचनां बध दानव धारी ।

खींचत चीर सभाय खचाखच ,

 दौपद को कुण दै दिल दारी ।

कौरव काळ भयो किण कारण ,

नारण आगळ कूकत नारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(१)




हेरत लाज जुऐ मिज हारत ,

 प्रीतम कोण बणै पतधारी ।

कौरव क्रोध कियो जब कायम ,

कोय न लागत है अब कारी ।

भीषम भाव भयो भय भीषण ,

है न विभीषण ना हितकारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी।(२)


 खेद मती दुरियोधन खेलत ,

सायब देखत खीचत सारी । 

हालत हीन दुराचर हींसत ,

पींचण पाप पगो पग पारी ।

द्रोपदि धीर अधीर दुसाशन ,

ना सत छौड़त नासत नारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(३)



पांडव दाव बधैं सब पांखड ,

हो सकुनी धत हीमत हारी ।

पांच पती अब है पछतावत ,

लानत दैकर जो ललकारी ।

साच छुटे छिटके सत सायब ,

नाविक कोण बणै निरधारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम ,

गौरव रूप बणो गिरधारी ।(४)


पीर परी गिरधारिय पारत ,

लानत तोड़ करो ललकारी ।

हे बलदेव बधूं बन हीमत ,

बेनड़ काज बणो बलधारी।

कूक सुणी जब कान कड़ाकड़ ,

खोट लगी दुरयोधन खारी ।

हे करुणा कर लाज बचा हम

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(५)


चीर बढ़ाकर चेन चुराकर ,

दी ललकार दु सासन धारी ।

हीमत हार हतास कियो हठ ,

सींचत चीर बढी बहु सारी ।

द्रौपद काज ख्याल रखे दिल ,

दीन दयाल दिवी दिलदारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी।(६)


अम्ब उसी पल आ अवतारित ,

सींचत जैम बढ़ी बहु सारी ।

पारण पार प्रभू पत पैखत ,

दीसत ना उथ दानव चारी ।

भाव सचै भगवान भजो तुम ,

प्रीत तहां रखसी पतधारी ।

हो करुणा कर लाज बचा हम,

गौरव रूप बणै गिरधारी ।(७)



          ।। छप्पय ।।

द्रौपद तणी दहाड़ , हाजिर हुओ हितकारी ।

दैण दुसाशन दाद ,पाळौ पुगो पतधारी ।

खींचताण खूंखार , सत पत बढाई सारी ।

पंचाळी सुण पुकार , गौरव बणै गिरधारी ।

सत अम्ब रखे नित सांवळौ , पंचाळी चीर पुरयो ।

करुणा द्रोपदी करे कृष्ण, धर्म सत गीता धरयो ।

आम्बदान जवाहरदान देवल आलमसर 


कवि चन्द वरदाई कृत जवलामुखी री स्तुति

चिंता विघन विनाशनी, कमलासनी शकत्त।

वीसहथी हॅस वाहनी, माता देहु सुमत्त॥1

 









                        छन्द भुजंगप्रयातम्

 

नमो आदि अन्नादि तूंही भवानी।

तुंही जोगमाया तूंही बाक बानी।

तुंही धर्नि आकाश विभो पसारे।

तुंही मोह माया बिखे शूल धारे॥1

 

तुंही चार वेदं खटं भाष चिन्ही।

तुंही ज्ञान विज्ञान मै सर्व भीनी।

तुंही वेद विद्या चऊदे प्रकाशी।

कला मंड चोवीस की रूप राशि॥2

 

तुंही रागनी राग वेदं पुराणम।

तुंही जन्त्र मे मन्त्र में सर्व जाणम।

तुंही चन्द्र मे सूर्य मे एक भासै।

तुंही तेज में पुंज मै श्री प्रकाशै॥3

 

तुंही सोखनी पोखनी तीन लोकं।

तुंही जागनी सोवनी दूर दोखं।

तुंही धर्मनी कर्मनी जोगमाया।

तुंही खेचरी भूचरी वज्रकाया ॥ 4

 

तुंही रिद्धि की सिद्धि की एक दाता।

तुंही जोगिनी भोगिनी हो विधाता।

तुंही चार खानी तुंही चार वाणी।

तुंही आतमा पंच भूतं प्रमाणी॥5

 

तुंही सात द्वीपं नवे खंड मंडी।

तुंही घाट ओघाट ब्रह्मंड डंडी।

तुंही धर्नि आकाष तूं बेद बानी।

तुंही नित्य नौजोवना हो भवानी॥6

 

तुंही उद्र में लोक तीनूं उपावे।

तुंही छन्न में खान पानं खपावे।

तुंही एक अन्नेक माया उपावे।

तुंही ब्रह्म भुतेष विष्णु कहावे॥7

 

तुंही मात हो एक ज्योती स्वरूपं।

तुंही काल महाकाल माया विरूपं।

तुंही हो ररंकार ओंकार बाणी।

तुंही स्थावरं जंगमं पोख प्राणी॥8

 

तुंही तूं तुंही तुं तुंही एक चण्डी।

हरी शंकरी ब्रह्म भासे अखण्डी।

तुंही कच्छ रूपं उदद्धी बिलोही।

तुंही मोहिनी देव दैतां विमोही॥9

 

तुंही देह वाराह देवी उपाई।

तुंही ले धरा थंभ दाढां उठाई।

तुंही विप्रहू में सुरापान टार्यो।

तुंही काल बाजी रची दैत मार्य॥10

 

तुंही भारजा इंद्र को मान मार्यो।

तुंही जाय के भ्रग्गु को गर्व गार्यो।

तुंही काम कल्ला विखे प्रेम भीनी।

तुंही देव-दैतां दमी जीत दीनी ॥11

 

तुंही जागती जोति निंद्रा न लेवे।

तुंही जीत देनी सदा देव सेवे।

अजोनी न जोनी उसासी न सासी।

न बैठी न ऊभी न पोढ़ी प्रकासी॥12

 

न जागे न सोवे न हाले न डोले।

गुपत्ती न छत्ति करंति किलोले।

भुजाळं विशालं उजाळं भवानी।

कृपालं त्रिकालं करालं दिवानी॥13

 

उदानं अपानं अछेही न छेही।

न माता न ताता न भ्राता सनेही।

विदेही न देही न रूपा न रेखी।

न माया न काया न छाया विषेखी॥14

 

उदासी न आसी निवासी न मंडी।

सरूपा विरूपा न रूपा सुचंडी।

कमंखा न संखा असंखा कहानी।

हरींकार शब्दं निरंकार बानी ॥15

 

नवोढा न प्रौढा न मुग्धा न बाली।

करोधा विरोधा निरोधा कृपाली।

अभंगा न अंगा त्रिभंगा न जानी।

अनंगा न अंगा सुरंगा पिछानी ॥16

 

शिखर पै फुहारो असो रूप तोरो।

अजोनी सुपावों कटे फंद मोरो।

पढ़े चंद छन्दं अभै दान पाऊं।

निशा वासरं मात दुर्गे सुध्याऊं॥17

 

सुनी साधुकी टेर धाओ भवानी।

गजं डूबते ही ब्रजंराज जानी।

भजे खेचरी भूचरी भूत प्रेतं।

भजे डाकिनी शाकिनी छोड़ खेतं।॥18

 

पढे जीत देनी सबै दैत नाशं।

भजे किंकरी शंकरी काल पाशं।

भजे तोतला जंत्र मंत्रं बिरोळे।,

भजे नारसिंगी बली बीर डोले॥19

 

निशा वासरं शक्ति को ध्यान धारे।

सु नैनं करी नित्य दोषं निवारे।

करी वीनती प्रेमसो भाट चंदं।

पढ़ंते सुनंते मिटे काल फंदं ॥20

 

तुंही आदि अन्नादि की एक माया।

सबे पिण्ड ब्रह्मांड तुंही उपाया।

तुंही बीर बावन्न वंदे सुभारी।

तुंही वाहनी हंस देवी हमारी॥21

 

तुंही पंच तत्वं धरी देह तारी।

तुंही गेह गेहं भई शील वारी।

तुंही शैलजा श्री सावित्री सरूपी।

तुंही शिव विष्णू अजं थीर थप्पी ॥22

 

तुंही पान कुंभं मधुपान करनी।

तुंही दुष्ट घातीन के प्रान हरनी।

तुंही जीव तूं शिव तूं रीत भर्नी।

तुंही अंतरीखं तुंही चीर धर्नी॥23

 

तुंही वेद में जीव रूपं कहावे।

निराधर आधार संसार गावे।

तुंही त्रिगुणी तेज माया लुभाणी।

तुंही पंच भूतं नमस्ते भवानी ॥24

 

नमोॐकार रूपे कल्यानी कमल्ला।

कलारूपं तूं कामदा तूं विमल्ला।

कुमारी करूणा कमंख्या कराली।

जया विज्जया भद्रकाली किंकाली॥25

 

शिवा शंकरी विश्व विमोहनीयं।

वराही चामुण्डा द्रुगा जोगनीयं।

महालच्छमी मंगला रत्त अख्खी।

महा तेज अंबार जालंद्र मख्खी ॥26

 

तुंही गंग गोदावरी गोमतीयं।

तुंही नर्मदा जम्मना सर्सतीयं।

तुंही कोटि सूरज्ज तेजं प्रकाशी।

तुंही कोटि चंदाननं जोत भासी॥27

 

तुंही कोटिधा विश्व आकाश धारे।

तुंही कोटि सुमेरू छाया अपारे।

तुंही कोटि दावानलं ज्वालमाला।

॥तुंही कोटि भयभीत रूपं कराला ॥28

 

तुंही कोटि श्रृंगार लावण्यकारी।

तुंही राधिका रूप रीझे मुरारी।

तुंही विश्व कर्ता तुंही विश्व हर्ता।

तुंही स्थावंर जंगमं में प्रवर्ता ॥29

 

द्रुगामां दुरीजन्न वंदे न आयं।

जपे जाप जालंदरी तो सहायं।

नमस्ते नमस्ते सु जालेन्द्र रानी।

सुरं आसुरं नाग पूजंत प्रानी ॥30

 

नमोंकार रूपे सु आपे बिराजे।

क्लींकार ह्रींकार ॐकार छाजे।

ओहंकार देवी सोहंकार भासं।

श्रियंकार हूंकार त्रींकार वासं॥31

 

तुंही पातकां नाशनी नारसींगी।

तुंही जोगमाया अनेका सुरंगी।

तुंही तूं ज जाने सु तोरो चरीतं।

कहां में लखों चंद तोरी सुक्रीतं ॥32

 

अपारं अनंतं जुगं रूप जानी।

नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी।

नमो ज्वाला ज्वालामुखी तोहि ध्यावे।

अभय सिघ्र वरदान को चंद पावे॥33

 

कहांलो बखानूं लघू बुद्धी मेरी।

पतंगी कहा सूर साम्हे उजेरी।

रति है तुम्हारी मति है तुम्हारी।

चिति है तुम्हारी गति है तुम्हारी॥34

जुगं हाथ जोरी कहे चंद छंदं।

हरो भक्त के दुःख आनंदकंदं।

हिये में बिरजो करो आप बानी।

नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी॥35

 

दोहा:

 

करि विनती यूं बंदिजन, सनमुख रहो सुजान।

प्रकट अम्बिका यूं कहयो, मांग चंद वरदान ॥1

 

छप्पय:

 

जयति जयति जग मात,जयति कारण सब करणी।

जयति भरण भंडार,जयति तारण भवतरणी।

जयति बुध्धि गुरुदेव,दत्त वायक वरदाई।

जयति आद अन्नादि,पींड ब्रहमांड उपाई।

अवलोक लोक साधत अखिल,करणी असुर वध कालिका।

रहो मोहि सहाय सब ठौर पर,जय जग चंडी ज्वालिका॥1

 

आदि अगम अवतार,दैत महिषासुर दरनी।

आदि अगम अवतार,कैटभ मधु भच्छण करणी।

आदि अगम अवतार, रगत शिर रहै रग्गदर।

आदि अगम अवतार, खळण दळ दळ्या खग्गधर।

सुर नर असुर साधंत नित,करणि दुष्ट वध कालिका।

रहो मो सहाय रणखेत मह,जय जग चंडी ज्वालिका॥2

 

शेषनाग साधंत,जपै उर आठौ जामहि।

अरक चंद्र उडुमाळ,नित्त सुमिरै गुण ग्रामहि।

ब्रह्मा विष्णु महेश, सिध्ध चारण सुरराई।

अहरनिशा सुर असुर,आपरी करत वडाई॥

ब्रह्मांड अखिल व्यापक शकति,करणि हरणि प्रतिपालिका।

कर जौरि चंद कवि उच्चरै, जय जग चंडी ज्वालिका॥3

दोहा:

 

कवि चंद रण खेत मै जबहि लरन को जाय।

तब आराधै शक्ति को, मंडै तत्व उपाय॥1

नागणी छंदः

 

रिध्धि दे, सिध्धि दे, अष्ट नव निध्धि दे, वंश मै वृद्धि दे ,बाकबानी।

ह्रदयमें ज्ञान दे, चित्तमें ध्यान दे, अभय वरदान दे, शंभुरानी।

दुःख को दुर कर,सुख भरपुर कर,आश संपुर कर दास जानी।

सज्जन सों हित दे,कुटुम्ब सो प्रीत दे,जंग मै जीत दे मां भवानी ।।

 

कवि काग बापू



चारण कवि काग बापू माताजी से विनती कर करे है की........... हे माँ मेरे कई अपराध है .....  मेरी अगणित भूले है .... लेकिन हे माँ अगर आपने मुझे छोड़ दिया तो मई कहा जाऊंगा ....हम तो आपकी संतान है.. .....इसलिए हे वीस भुजा वाली माँ अब आप हमे ऐसे ही ना छेड़े ..........

veeshbhuja wali

........ *झूलणां - छंद* ........


भान बेभानमां मात ! तुजने रट्या, विसारी बापनुं नाम दीधुं...,

चारणो जन्मथी पक्षपाती बनी, शरण जननी तणुं एक लीधुं...,

तें लडावी घणा लाड मोटा कर्या,प्रथम सत्काव्यनां दुध पायां...,

खोडले खेलव्या बाळने मावडी, आज तरछोड मा जोगमाया!.....१



रास रमति हती अमतणी जीभपर, झणण पद नूपुर झणकार थातां...,

सचर ने अचर सौ मुग्ध बनतां हतां, ताल दइ संगमां गीत गातां हतां...,

नर नराधिश जगदिश रीझ्या हतां, अमतणां ए ज झरणां सुकायां,

खोडले खेलव्या बाळने मावडी.....२



देशभक्ति तणां रण मरण मोक्षनां, पाठ क्षत्रीनां अघरा पढाव्या...,

रंक रक्षण तणां दृष्ट भक्षण तणां, आकरां पाण तेगे चडाव्यां...,

लग्न वरमाळ काढी लडाव्या हता, आज निरविर्यना गुण गाया...,

खोळले खेलव्या बाळने मावडी.....३



आत्म-अरपण तणां प्रथम भुव भारते, चारणें कंठथी सूर छेड्या...,

लाखना लोहीनी धार अटकाववा, चारणे आपना लोही रेड्यां...,

सत्य आग्रह तणां उपासक आदीथी, स्वतंतर जीवननां गुण गाया...,

खोळले खेलव्या बाळने मावडी...४



सत तणां स्वांग रणभोम रंगमे'ल मां, पे'रीने असतना दांत झेर्या...,

अंबिका! तुजतणा ए ज पुत्रो अमे, असत ना शामळा पाठ पे'र्या...,

अंध लंपट अने नफट छोरु बने, मात छोडे नहीं तोय माया...,

खोळले खेलव्या बाळने मावडी.....५



जगत सेवातणां काव्य ललकारीये, झुंपडे झुंपडे गीत गाइए...,

भीख साहित्य नी मांगशे क्षत्रीयो, देव एवा फरीवार थाइए...,

"काग" खेडुतनी खेडी धरणी परे, मे'र वरसाद नी वाट माया...,

हवे..... खोळले खेलव्या बाळने मावडी.....





आज तरछोड मां जागमाया....

💐 *रचना --- चारणकवि कागबापु 

श्री ईसरदास रो जस ।।




        ।। दौहा ।।


ईस इळापर  अवतरे ,

सूरे घर सुरवेस।

कापड़ियो हिंगलाज रो,

भळक्यो भादरेस।(१)


भू उजाळ भादरेस री ,

गायो जस गुजरात।

छायो गुण हरिरस छटा,

खमां ईसरा ख्यात।(२)


ईस सदानंद अरसियो,

रूप हरीरस राच।

टीकम मिळयो तिणघड़ी ,

वेण वेद गुण वाच।(३)


रूप हरीरस राम रो,

श्री धर रहत संगाथ।

पाप झड़े सब पिंड रा,

नमे त्रिभुवन नाथ।(४)


साच दुरगा सप्तसती

दर्स कर देवियांण ।

जप तप सतसुख जगत रो

जगदंब गती जाण।(५)


सांप्रत हरी साखणै,

आपी पदवी अष्ट ।

सांपी हरिवर सायबी,

नुगरा पण की नष्ट ।(५)


 खटमासां खंखाळियो,

सांगो नदी संगाथ ।

लायो ईसर लोकमों,

परंम धजावण पाथ।(६)


कांबळ ओढण कारणे,

महकायी मरजाद।

सांगो बुलाय सरगसुं ,

जाणप राखी याद।(७)


ईस ईसवर ऐकही,

ऐकि गती अवसाण।

 नेक नीति  नारायणो ,

प्रेम अम्ब पहचाण ।(८)


 जग जुहार कर जांचलौ,

हर रस हरिरस हेक।

नेक टेक री नीतियां ,

अखी हरिगुण अनेक।(९)


  ।। छंद मत गयंद सवेया ।।


ईस अनेक विधीय अराधत 

वेद सुवेण सुधार वचायौ।

आप (दै) उजास विवेक अहोनिस ,

 पौ परमारथ पंथ पढायौ।

होत हुलास उलास सदा हरि

 नाथ नवाखँड में निरखायौ।

वेद तणो कर छाण विसंभर ,

 ध्यान सदा नँद ईसर  धायो ।

जिय रीत रचाकर धीस रिझायो ।(१)


साच निवास उपास  सदाशिव ,

 वास सुवास विलास वसायो।

आपहि ग्यान कियोय उजागर ,

देव सँसार हरी दरसायो।

नाथ अनाथ समाथ नवेनिध ,

 वेण निरँत्तर नाम वचायो।

वेद तणो कर छाण विशंभर ,

 ध्यान सदानँद ईसर  धायो ।

जीय रीत रचाकर धीस रिझायो।(२)


हेत रिदेरस हीर हसावण , 

वीठल वास दिलां विलसायो।

पात कि बात समाथ पढावण , 

रास सदा रघुनाथ रचायो।

ग्यान सुणाय रचाय गुरू गुण, 

सार हरीरस मैं समझायो।

वेद तणो कर छाण विशंभर ,

ध्यान सदा नंद ईसर धायो ।

जिय रीत रचाकर धीस रिझायो (३)


वेल वधारण लाज बचावण , 

बात निभावण गोड़ बुलायो।

कांबळ को बगसावण कांरण,

 पात सनातन पाठ पढायो।

संग जिमाय सखाचित साचकि ,

मोहन रूप मनां मुळकायो।

वेद तणो कर छाण विशंभर ,

ध्यान सदा नंद ईसर धायो ।

जिय रीत रचाकर धीस रिझायो ।(४)


 सप्तसती दुरगा दिल सारण ,

देवि पुराण दिलां दरसायो।

अष्ट पदां विच पारस ईसर ,

प्रीत घणी परमेसर पायौ।

गाय सुणाय रसा गिरधारिय,

झार अमीरस जाप जपायो।

वेद तणो कर छाण विशंभर ,

 ध्यान सदा नँद ईसर धायो ।

जिय रीत रचाकर धीस रिझायो ।(५)


धीस रमाड़ खँमा धरणीधर , 

तो सरणो दुनियांण तरायो।

ईस विधी सुर अाप उपासत , 

अंतर आदर भाव उपायो।

वीठल वास रिदे सुर वायक  ,

चेन चितां चरचा चरचायो ।

वेद तणो कर छाण विशंभर ,

ध्यान सदा नँद ईसर धायो ।

जिय रीत रचाकर धीस रिझायो ।(६)


ग्यान गुरू गुण  आखर गोतर ,

 भाण पितांबर भाव भणायौ।

ईस छटा छलकाकर आपहि , 

पात सनातन पाठ पढायौ। 

हेत रमाय हरी हिरदै मिझ ,

मालक मोज मनां मुळकायौ।

वेद तणो कर छाण विशंभर ,

ध्यान सदा नँद ईसर धायो ।

जिय रीत रचाकर धीस रिझायो ।(७)


नीर समाय सदासुख नारण ,

देव दिलां विच में दरसायो।

अश्व समेत समाय अखीसुख ,

नेह निभावण नारण नायौ।

अाखत अम्ब महासुख आसन ,

प्रीत सुँ ईसर दर्सण पायो।

वेद तणो कर छाण विशंभर ,

ध्यान सदा नँद ईसर धायो ।

जिय रीत रचाकर धीस रिझायो ।(८)


          ।। छप्पय ।।

रास हरिरस रमाण ,  

गुरू गिरधर गुण गायौ ।

कापड़ियो  हिंगलाज ,

 ईस सूरे घर आयौ।

ज्वालागिरि जगदीस , 

बाण सांगौय बुलायौ।

कर्ण जीवत करेह , 

सत जगदीस समझायौ।

आदेस अहोनिस ईसरा ,

 सदानंद आंणद सदा।

नाम ईसर नित अम्ब नमो , 

जाणूँ न ईस सूँ जुदा ।


आम्बदान जवाहरदान देवल आलमसर 

मातेश्वरी स्तुति (छंद - भुजंगप्रयात*)


*🙏🏻छंद - भुजंगप्रयात*🙏🏻



दुष्ट विकारो डारिणी मंगल करणी मात
भवसागर भव तारिणी वंदू माँ विख्यात

नमामी प्रभा पार्वती वेदमाता
प्रसिद्धा तुं सिद्धा जगत जन्मदाता
मृडानी महामेघमाला निराला
तुं ही चैतरी रक्तदन्ता कराला

अभीरु तुं ही भैरवी भोग ग्राही
तुं ही वायुमंडळ खडक तुं प्रवाही
अनामी तुं ही तुं सहस्त्राय नामी
तुं ही सिद्धिदा बुद्धिदा सर्वगामी

तुं ही ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्य शूद्रा
तुं ही मूलधारा तुं ही मूलमु़द्रा
तुं ही अष्टसिद्धि प्रदायं भवानी
तुं ही भाण रुपे युगे युग रवानी

तुं ही ज्योत रुपे प्रदीपं प्रकाशी
बनी ज्योत ज्वाळा वळी दैत नाशी
तुं लक्ष्मी स्वरूपे महामोह माया
तुं ही कामदा मोक्षदा शंभु जाया


महाकाल कालं करालं तुं काली
तुं ही देव तारण दयाली कृपाली
तुं ही लेखिनी लेख लेख्या सुलेखा
तुं संध्या सुपर्वा सुमेधा सुरेखा

तुं ही बालक्रीड़ा वयोवृद्ध रूपं
तुं दिव्या तुं दीप्ता अनेका अनूपं
तुं प्राची अवाची जगत जन्मदात्री
धरा धान धरणी शिशूप्रिय धात्री

तुं ही डाकिनी हाकिनी दीर्घनिंद्रा
तुं ही नूतना पूतना मात इंद्रा
निशाचर हरी अट्टहासं करंती
तुं ही दिव्य शक्ति त्रिलोके फरंती

तुं ही अन्नपूर्णा भये अन्नपुष्टि़ 
तुं ही मेघमंडल तणी घोर वृष्टि़ 
धरी ध्यान म्हारी अरज कान लीजो
सदा कूख चारण जनम सिद्ध दीजो



छंद सारसी ( भद्रकाळी )




छंद सारसी ( भद्रकाळी  )




दोहा


दसविध री देवी महा,प्हैली काली रूप।
आवड कीरत आखवा,आखर देय अनूप॥1
काली रूप कपालिनी, खपराळी खळ खाण।
नरमुँड माळी व्यालिनी,प्याली शोणित पान॥2

छंद सारसी


क्रां भद्रकाळी, क्रीं कृपाळी, क्रूं कराली, कालिका।
मां मुण्डमाळी, डं डमाली, वपु विशाळी, ज्वालिका।
जय जगतपाली, वृद्ध बाली वेश भाळी मावडा।
काली कराली, वदन वाली, अस्थिमाली, आवडा॥1



समसान वासी, अट्टहासी, वपुअमासी, कज्जला।
प्रति पल पिपासी, पुंज राशी, भव्य भासी, चप्पला॥
मेटो उदासी, हिये वासी, फँस्यौ फासी, डावडा।
काली कराली, वदन वाळी, अस्थि माळी, आवडा॥2


मां शवारूढा, गहन गूढा,बाळ बूढा, वेसरी।
गळमाळ तुंण्डा, तुं चामुँडा, शगत झुंडां, ले खरी।
खळ महिख खंडा, चंड मुंडा, दैत दंडा, तुं वडा॥
काळी कराली, वदन वाळी, अस्थिमाली आवडा॥3


जय खळ खपाणी, खडग पाणी, राज राणी, शंकरा।
सगती शवानी, मां शिवानी, है श्मशानी, तूं परा।
वरदान दानी, जगतजांणी, है ईशानी, भख-मडा।
काळी कराली वदन वाळी,अस्थिमाली आवडा॥4


घन नील श्यामा, शर्व वामा, हे ललामा, कामदा।
भव तणी भामा,विविध नामा, वंदना मां, सर्व दा।
काटो तमामा, वेदना म्हां, हिय हामां, डावडा।
काली कराली, वदन वाली , अस्थिमाली, आवडा॥5


त्रय नेत्र वाली, वहै पाळी, घण उताळी, हिंगुला।
मुख जिह्व ज्वाली, वपु विशाली,महा काली, चंचला।
दंष्ट्रा डढाळी, हे दयाळी, नेह न्याळी, धा वडा।
काली कराली, वदन वाळी, अस्थिमाली आवडा॥6


खळ दळां खंडी,दैत दंडी, मां प्रचंडी, ईसरी।
जळहळ अखंडी, लाल झंडी, युध्द चंडी, तूं खरी।
चामुंड चंडी, विश्व वंदी, मात मंडीत तु वडा।
काली कराली, वदन वाली, अस्थिमाली आवडा॥7


क्लीं कान्ह कारी, रूप वारी, शव सवारी, वंदना।
दिगवसन वारी, है हजारी, वार वारी, प्रार्थना।
नरपत तिहारी, शरण मां री, कर दया री, मामडा।
काली कराली, वदन वाली, अस्थिमाली, आवडा॥8



दोहा


आवड मावड आपही, काली कृष्ण स्वरूप।
नमन मात महिमामयी,भवा आप सुरभूप॥